सम्पादकीय - वे कह सकते हैं कि भाषा की ज़रुरत नहीं होती

(आलोचना) अल्पविचारित कवि और साहित्यिक सुयोग्यता – सुधीर रंजन सिंह

(लेख) अस्मिता की राजनीति, मार्क्सवाद और जाति उन्मूलन - सचिन

(कहानी) एक आधा इश्क़ - पंकज दुबे

राज शेखर की कविताएँ

(विचार) ठगने वाला नारा है ‘जय किसान’ - गिरीन्द्र नाथ झा

(कहानी) कनखजूरा - प्रकृति करगेती

अखिल कत्याल की कविताएँ

(धरोहर) ये है एक जब्र इत्तेफ़ाक नही जॉन होना कोई मजाक नही - सौरभ कुमार सिन्हा

रंजना त्रिपाठी की कविताएँ

(कहानी) लत - नीरज पाण्डेय

ब्रिजेश देशपांडे ‘वारिस’की कविताएँ

(लेख) पाकिस्तान में जाति: चुप्पी के षडयंत्र का शिकार एक सवाल - शाहबानो अलियानी

(समीक्षा) शंकराचार्य का रचनाकर्म – लवली गोस्वामी