अखिल कत्याल की कविताएँ

चाहने से क्या नहीं मिलता

आकाश दो तिहाई ‘काश’ है
आसमां आधा ‘आस’ है
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दिल्ली की गर्मी

रौशनी भी हल्के-हल्के पिघलती है।
अमलतास।
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तुम याद आते हो

जैसे नाईट-ड्यूटी पर नींद आती है,
बिन बुलाए, हमेशा।
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दुआ, इन दिनों

सोच में आज़ादी हो,
प्लेट पर खाना हो,
किस्म-किस्म के लोगों
का आना-जाना हो,
बात-चीत हो बहस में,
प्रेम हो, क्रोध हो, जिज्ञासा
हो हर रहस्य में, नाचना हो,
गाना हो, पन्नों में लिपटा हर
ख़याल हो पुस्तकालय में,
विश्व हो विश्वविद्यालय में

(एच.सी.यू के लिए)
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कि कुछ तो असर हो जाए

कि कुछ तो असर हो जाए
बस वो रात बसर हो जाए
बस
कविता से उतना ही होता है
कि उस रात की पौ तो फटी
जैसे भी हो, रात तो कटी
खैर मनाओ
कविता से इतना तो होता है

(नताशा के लिए)
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दिल्ली निवासी अखिल कत्याल लेखक, शिक्षक व अनुवादक हैं।

ईमेल - akhilkatyal@gmail.com