(कहानी) कनखजूरा - प्रकृति करगेती

अजवाइन पर मंडराती तितलियों को देखते हुए कई शूक्ष्म जीव उसकी आँखों के आगे मंडराने लगे. तितलियाँ तो अजवाइन के सफ़ेद फूलों पर पहले से ही मंडरा रही थी. पर अचानक उसने महसूस किया कि कैसे मूरे- मच्छर, पर लगी चीटियाँ, टिड्डे भी नज़र आने लगे. नज़र नीची की तो पाया कि असंख्य कीड़े कुलबुला रहे थे. घोंघे रेंग रहे थे. सभी की अपनी अपनी गति थी. और असल में वो हमेशा ही गतिवान रहते थे. उसकी तरह यूँ रुककर, वो विशालकाय इंसान के बारे में नहीं सोचने लगते. पर वो उनके बारे में सोच रहा था. बगीचे में आकर, कोने में छुपकर और कोई विकल्प भी नहीं था.

उसने सोचा कि वो कितना बदरंग है. उसकी चमड़ी का रंग लाल, हरा, पीला, नीला, गुलाबी नहीं. और हो भी नहीं सकता था. वो अजवाइन के सफ़ेद फूलों का रंग नहीं ओढ़ सकता था, बस उस रंग की एक नकली परत ओढ़ सकता था. वो चिड़िया की रंगीली चोंच के रंगों का रत्ती भर भी ख़ुद में नहीं देख सकता था. उसने सोचा कि ये कैसी बदनसीबी है कि वो आम सा नहीं झूल सकता था. वो मिर्च का कुंडल बन छोटे-छोटे पौंधों पर नहीं लटक सकता था. उसका मन हुआ कि वो कांटा बन जाए और अनजान उँगलियों पर चुभ जाये. तो कभी किसी के लहराते दुप्पटे को फाड़ जाए. और फ़िर भी उससे कोई कुछ न कह पाए. वो मच्छर बन किसीका खून चूसना चाहता था. और फ़िर बेफ़िक्र हो उड़ जाना चाहता था. अगर सज़ा मिलती तो बस मौत की. उससे ज़्यादा कुछ नहीं.

वो यहीं सब सोच रहा था कि एक आवाज़ आई. उड़ते साँपों सी तैरती उसके कानों तक पहुँची. और कानों के अन्दर पहुँच एक कनखजूरे में बदल गयी. कनखजूरा कान के अन्दर चक्कर काटता बोल पड़ा- “ खाना खाने के लिए भी क्या अब आरती उतारनी पड़ेगी?”

वो उठ खड़ा हुआ. कनखजूरा चक्कर काटे जा रहा था. वो आवाज़ की तरफ़ खिंचता हुआ, आगे बढ़ा. सीडियाँ उतरते हुए कीड़े भी साथ हो लिए. जिन्हें वो हर सीढ़ी पर कुचलता गया. उसके चप्पलों पर जिनका मांस चिपकता गया. ये वो जानता था. पर वो नीचे उतरता गया.

दरवाज़े की कुण्डी खोलते हुए, उसके अन्दर बैठा शैतान तोता बोला “ क्या हुआ अगर तुम हम जैसे नहीं बन सकते ? तुम्हें डांटने फटकारने वाले भी बस इंसान ही हैं. तुम जिन कल्पनाओं के कीड़ों को कुचलकर आये हो, वो तो उनके बारे में जानते तक नहीं! तुम उनसे बेहतर हो. और तुम कभी भी हमारे पास आ सकते हो. जब भी तुम्हें बगीचे का आसरा चाहिए होगा, आ जाना. कुचले हुए कीड़े फ़िर से जिंदा हो जायेगा. तुम्हारी तरह. और तुम्हें हम वैसे के वैसे ही मिल जायेंगे- उड़ते, रेंगते, कुलबुलाते, मंडराते, लटकते, झूलते. तुम बस आ जाना.”

दरवाज़े के पार जाते जाते वो सुनता रहा. डाइनिंग टेबल पर पहुँचा तब भी उसका ध्यान तोते की बातों पर ही था. उसने जवाब में कहा “ ठीक है”. और कहकर मुस्कुरा दिया.

डाइनिंग टेबल पर जो औरत बैठी थी उसने तड़ककर कहा “ क्या ठीक है? अपने आपसे बात करते रहने वालों को पता है क्या कहते हैं ?”

औरत ने जवाब का इंतज़ार किये बिना ख़ुद ही जवाब दे दिया, “ पागल! पागल कहते हैं!”

“ तुम्हारा इंतज़ार करती, तो भूखी मर जाती. तुम्हारी प्लेट लगा दी है. खाकर मेहेरबानी करो.”

औरत डाइनिंग टेबल से उठ गई. और उसने देखा कि औरत को सामने के दरवाज़े ने निगल लिया था. वो मुस्कुराया. और टेबल पर बैठते हुए, उसने कनखजूरे को कान से निकाल फेंका. कनखजूरा ज़मीन पर पड़ा उसकी चप्पल के पास रेंगता रहा. उसने देखा तो पाँव अपने आप ऊँचा हो गया. कुचलने का ख़याल और उसका पाँव यूँ ही हवा में कुछ देर लटकते रहे. फ़िर दोनों ही अपने लक्ष्य को चूंकते, नीचे गिर गए. कनखजूरा रेंगता रेंगता कहीं निकल गया.

उसने रोटी का कौर तोडा और बस चार बार चबाकर निगल लिया. खाने के स्वाद की उसने कल्पना करी. मीठा, नमकीन, तीखा, खट्टा! पर कडवे ने सबको काट दिया.

वो फ़िर से मुस्कुरा दिया, ये सोचकर कि कनखजूरे को मारकर वो करता भी क्या ! कनखजूरा उसके कानों में पहले ही अंडे दे चुका था.

प्रकृति करगेती युवा कवि और कहानीकार हैं. हंस, जनसत्ता, शुक्रवार, असुविधा, जानकीपुल जैसे विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और ब्लॉग में रचनायें प्रकाशित हुई हैं. कहानी के लिए राजेंद्र यादव हंस कथा सम्मान 2015 से सम्मानित. पत्रकारिता से जुडी हैं. आजकल मुंबई में बीबीसी में कार्यरत हैं.

ईमेल - prakritik7@gmail.com