(विचार) ठगने वाला नारा है ‘जय किसान’ - गिरीन्द्र नाथ झा

जिस नारे से मुझे सबसे ज़्यादा चिढ़ है, वह है- ‘जय जवान, जय किसान’। दरअसल ‘जवान और किसान ‘ को मुल्क में बड़ी मासूमियत से पेश किया जाता रहा है। मानो ये दोनों नाम अपने भाग्य का रोना रोते हों और कोई बड़ी शक्ति आकर इन्हें सहारा देती हो और यह भरोसा देती हो: " सब ठीक हो जाएगा, आप सब यूँ ही खेत और सीमा पर लड़ते रहिए". किसान और जवान आराम से ठग लिए जाते हैं। वे इस बात को लेकर बहस ही नहीं करना चाहते हैं कि उनकी जय जय आख़िर क्यों? जब वे मुश्किल में रहते हैं तो फिर उनके नाम का जयकारा क्यों?

पिछले तीन साल से जमकर खेती कर रहा हूं, ठीक वैसे ही जैसे दिल्ली और कानपुर में समाचार एजेंसी और अख़बार के दफ़्तर में काम करता था। नौकरी करते हुए महीने के अंत में तनख़्वाह उठाता था और किसानी करते हुए चार महीने में एक बार फ़सल बेचकर पैसे समेटता हूं।

किसानी करते हुए लिखता पढ़ता भी हूं। अख़बारों के लिए लिखता हूं तो कभी ख़बर भी बन जाता हूं। यह सब करते हुए मैं एक किसान के तौर पर अब खुलकर कहने लगा हूं कि ‘किसानी करते हुए ख़ुश हूं और आप सब मुझे खटारा खेती करते हुए रोता हुआ किसान मत कहिए’। और हाँ, आप ‘जय किसान’ के नारे वाले मोड में मुझे मत देखिए।

हो यह रहा है कि किसान को हम- आप सब्सिडी और मुआवज़े के लिए रोते - बिलखते देखते आए हैं। आज से नहीं बल्कि वर्षों से। आप सब किसानी कर रहे लोगों को भूमि अधिग्रहण के नाम सड़क जाम करते हुए देखते आए हैं।

किसान को सूखा, बाढ़, आँधी और बिन मौसम बारिश के चपेट में सबकुछ लूटाते हुए एक बने-बनाए फ़्रेम में अबतक देखते आए हैं। लेकिन आपने कभी उससे यह सवाल नहीं पूछा कि जब आप अपनी ज़मीन किसी बिल्डर या कम्पनी को बेच देते हो तब मिलने वाले पैसे से बचे खेत में उन्नत तरीक़े से खेती क्यों नहीं करते हो? बच्चों की शिक्षा में निवेश क्यों नहीं करते हो? केवल एसयूवी में निवेश क्यों? आख़िर बड़े जोत वाले किसान भी किसानी छोड़कर महानगर का रूख क्यों कर रहे हैं? या यह सवाल क्यों नहीं पूछा जा रहा कि वे खेती की ज़मीन बेचकर फ़्लैट क्यों ख़रीद रहे हैं।

वहीं दूसरी ओर किसानी को लेकर एक और नज़रिया है। आप सोचिए जब कोई किसान ख़ुश दिखता है, मौसम की मार सहने के बाद भी अपनी रोज़ी रोटी चला रहा होता है, खेत में नए प्रयोग कर रहा होता है और किसानी समाज को रोजगार भी दे रहा होता है...तो ऐसी बातें सुनकर आपके चेहरे का भाव ऐसा क्यों बन जाता है मानो किसी दूसरे ग्रह का प्राणी खेत में आ गया हो! आख़िर किसान ख़ुश क्यों है? यह बात जब कई लोग सुनते हैं तो परेशान हो जाते हैं।

बात यह है कि हम सबलोगों को किसानों को लेकर अपना नज़रिया बदलना होगा। इस समाज को सब्सिडी- मुआवज़े के राग से छुटकारा दिलाना होगा। आख़िर हम कबतक ख़ुद ही अपने पेशे को कोसते रहेंगे? कबतक अपने बच्चों को खेती से दूर रहने की सलाह देते रहेंगे? नज़रिए को लेकर जितनी ग़लती आपकी है उतनी हम किसानी कर रहे लोगों की भी है।

गुज़रे इन तीन साल में मेरी मुलाक़ात गिनती के ऐसे किसानों से हुई है जो यह न कहता हो कि ‘मैं ऋण में हूं’ हम सब बिना मेहनत किए पैसे उठाकर खेती करते हैं और फिर बैंक को लौटाने के वक़्त फ़सल बर्बाद होने का रोना रोने लगते हैं। ऐसे में जय किसान का नारा पॉलिटिकल हो जाता है और चुनावी गणित के गुणा भाग में किसान सबसे मासूम निशाना बन जाता है।

पंचायत चुनाव से लेकर विधानसभा-लोकसभा चुनाव तक आपने कभी सुना है कि किसानों के लिए यह कहा गया हो कि आप शानदार फ़सल उपजाएँ, सरकार हाथों-हाथ ख़रीद लेगी? नहीं सुना होगा आपने। आपने सुना होगा- बोरिंग के लिए अनुदान मिलेगा, डीज़ल अनुदान, किसान क्रेडिट कार्ड, मनरेगा के तहत मिट्टी ढोते रहिए, रोज़गार मिलता रहेगा... आदि-आदि। जबकि सच यह है कि ऐसे वादे सुनकर हम किसानी कर रहे लोग और आलसी होते जा रहे हैं।

ज़रा सोचिए, बीड़ी-तम्बाकू आदि के लिए तो हमारे पास पैसा है लेकिन पाँच से दस रूपए के कदंब के पौधे के लिए हम सरकार पर निर्भर हैं! आख़िर क्यों? बाग़वानी के लिए भी हमको ऋण चाहिए, हम इतना ऋणी क्यों होना चाहते हैं? यही वजह है कि मुझे जय किसान के नारे से चिढ़ है। मुझे तो महात्मा गांधी रोज़गार गारंटी योजना से भी चिढ़ है। खेत के बदले हम सड़क पर मिट्टी बिछाने लगे हैं। जिसके पास किसानी की समझ है वह भी मज़दूर बनता जा रहा है।

ऋण में डूबने के बजाए हम किसानों को आत्मनिर्भर बनने दीजिए। हमें और मेहनत करने दीजिए। किसानी में हो रहे नए शोध कार्य से परिचित करवाइए। यदि हम नया कर रहे हैं तो हमारी तारीफ़ करिए, ग़लती करें तो आलोचना करिए लेकिन ऋण में डूबने की सलाह मत दीजिए। नहीं तो वह भी वक़्त आएगा जब आप गाँव में सरकारी ख़र्च से शौचालय तो बनवा देंगे लेकिन उसके उपयोग के लिए आपको हमें अनुदान देना होगा।

आपका किसान

गिरीन्द्र नाथ झा

ग्राम-चनका

ज़िला- पूर्णिया

बिहार

गिरीन्द्र नाथ झा दिल्ली विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातक हैं। सीएसडीएस-सराय के फ़ेलो रह चुके हैं। इसके बाद पाँच वर्षों तक दिल्ली और कानपुर में पत्रकारिता करने के बाद इन दिनों बिहार के पूर्णिया ज़िला के चनका गाँव में अलग ढंग से खेती बाड़ी और ब्लॉग लेखन। हाल ही में राजकमल प्रकाशन से किताब प्रकाशित हुई है - इश्क़ में माटी सोना।

ईमेल - girindranath@gmail.com