राज शेखर की कविताएँ

प्रेम, बारिश और इंक़िलाब

पता है मुझे
कविता से
कमसकम मेरी कविता से
न निज़ाम बदलता है,
न प्रेमिका मानती है
और न ही बादल आते हैं..
बहेलिया नहीं बदलता अपना मन
कुल्हाड़े लिए हाथ नहीं रुकते
कोई इंक़िलाब कहाँ आ पाता है कविताओं से
फिर भी
ख़ुद को ज़िंदा रखने के लिए
ज़िंदा दिखने के लिए
लिखता हूँ कुछ
क्या पता
अगर ज़िंदा रह गया तो
प्रेम, बारिश और इंक़िलाब
सब आ जाये किसी दिन.
--

यक़ीन

सबसे स्याह रात के पूरब से
आएगा सबसे लाल सूरज
बस तुम्हारी उम्मीद भरी
आँखों के लिए.
--

फ्रिज़ पर चिपका एक नोट

बिनी,
छत के उस कोने
जहाँ बोरियों में रखा सीमेंट जम गया है
एक टूटे गमले में
सबसे छुपा
कुछ जिद्दी नवम्बर बो दिए हैं मैंने
देखते रहना ..
अपनी हंसी से सींचते रहना …
फरवरी तक, शर्माती हुयी सिंदूरी कोंपले आ जाएंगी
फिर मार्च तक फल .
थोड़ा थोड़ा काट कर
सबमें वसंत बाँट देना!
--

रस्ते के लिए

मैं तुम्हारे लिए लाया हूँ
थोड़ा गुड़
थोड़ा ऊन

और एक प्रेमगीत-
लगभग तुम्हारी आँखों सा निष्छल
और तुम्हारी हँसी की तरह गड्डमड्ड
...
और?
...
बस!
--

लगता है सब ठीक हो जायेगा…

पापा की ख़राब तबियत,
जहानाबाद में सात की नृशंस हत्या,
फिर 12 जनवरी को अचानक
तुम्हारा बता देना कि
तुम अब मेरे साथ नहीं हो..
लगता है सब टूट रहा है..
पर
जब मुसहर टोली में बजते
रेडियो पर
मैथिली लोकगीत की आवाज़ आती है
और माँ जब फोरन से दाल छौंकती है

लगता है
सब ठीक हो जायेगा..
--

हिंदी साहित्य में एमए राज शेखर कवितायेँ (पाखी, चकमक, प्लूटो .. ), बच्चों के लिए कहानियाँ/अनुवाद (बीइंग बॉयज, रुरु राग, पाँच छोटे बन्दर, पकड़ो! उस बिल्ले को- तूलिका), फ़िल्मी गीत (तनु वेड्स मनु, ऊँगा, इसक, तनु वेड्स मनु रिटर्न्स) और दोस्तों को चिट्ठियाँ लिखते हैं. मजनूं का टीलापर अपनी कविता सुनाते हैं और बाक़ी वक़्त वो अपने खेत, गाय, कबूतर और चाँद के बारे में सोचते हैं.

ईमेल - rajshekharis@gmail.com