(लेख) अस्मिता की राजनीति, मार्क्सवाद और जाति उन्मूलन - सचिन

हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहित वेमुला की आत्महत्या के बाद एक बार फिर दलित उत्पीड़न पर विमर्ष ने प्रमुख स्थान ग्रहण कर लिया है। इस उत्पीड़न के खिलाफ प्रतिरोध और उससे मुक्ति पर विमर्ष काफी तेज हो गया है। इस दौर की खास बात यह है कि इन दिनों हर कोई जय भीम कहने को बाध्य हुआ है। आज भारतीय समाज में जातीय उत्पीड़न और उससे मुक्ति के लिए व्यापक जनता की एकता के लिए नीले और लाल रंगवालों के एकताबद्ध संघर्ष के ऊपर बहस छिड़ गई है। ऐसे में यह समझना जरुरी है कि भारत में जाति के सवाल को मुख्यधारा के मार्क्सवादियों ने कैसे गलत समझा है और किस प्रकार इसने व्यापक जनता की मुक्ति के सवाल को प्रभावित किया है। इन सवालों को समझने के लिए भारतीय राज्य के बुनियादी चरित्र को समझना जरुरी है।

भारत का राष्ट्रीय संघर्ष कितना राष्ट्रीय?

इंगलैंड की औद्योगिक क्रांति के बाद दुनिया के पटल पर राष्ट्रीय क्रांतियों का सूत्रपात हुआ। इन राष्ट्रीय क्रांतियों ने सामंतवाद के अंत का रास्ता प्रशस्त किया और एक हद तक समाज के जनतांत्रिकरण की प्रकिया को आगे बढ़ाया। एशियाई और अफ्रिकी मुल्क जो 20 वीं सदी के पूर्वाद्ध तक उपनिवेश थे, में राष्ट्रीय संघर्ष सामंतवाद के गठजोड़ में ही विकसित हुआ। भारत में अंतिम समय तक इस संघर्ष का एजेंडा ब्रिटिश साम्राज्यवाद के अंदर ही साम्राज्यी शोषण से रियायत हासिल करना भर रहा। दरअसल यह राष्ट्रीय संघर्ष भी अपने अंदर समाज के अंदर के प्रभुत्व और सत्ता संरचना को समेटे हुए था। यह देश के आम अवाम की आवाज नहीं बन पाया बल्कि यह समाज में सत्ता संरचना में बैठै प्रभुत्वषाली लोगों की आवाज बन कर उभरा। इसी कारण से जब इस राष्ट्रीय संघर्ष में शहीद भगत सिंह और बाबा साहब अंबेदकर को अपनी आवाज नहीं मिली तब उन्होंने अपनी आवाज अलग से उठायी।

इस तरह 1947 के बाद जिस नई सत्ता संरचना का उदय हुआ वह समाज के अंदर की सत्ता संरचना का ही प्रतिबिंबन था। इसने समाज के व्यापक जनतांत्रिकरण के बजाए पुरानी सत्ता संरचना को ही आगे बढ़ाया। इसकी झलक हम संविधान सभा में भी देख सकते हैं। संविधान सभा में बाबा साहब भले ही सर्वोच्च पद पर थे लेकिन कांगेस ने तमाम समितियों और उप समितियों की संरचना इस तरह बना रखी थी कि बिना उसकी सहमति के कोई भी कानून न बन पाए। आनंद तेलतुंबडे ने अपने एक आलेख में क्रिस्तोफ जेफरले के एक उद्धरण का हवाला देते हुए कहा है कि संविधान सभा की सबसे महत्वपूर्ण समिति- सलाहकार समिति के सदस्यों में 6.5 फीसदी अनुसूचित जाति जबकि 45.7 फीसदी ब्राह्मण थे। ज्ञातव्य है कि यह संविधान सभा महज 28 फीसदी लोगों का प्रतिनिधित्व करती थी जिन्हें 1935 के भारतीय सरकार अधिनियम के तहत वोट देने का अधिकार था। इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी बाबा साहब ने जिस तरह इस संविधान सभा में उत्पीड़ित जातियों के हितों के लिए संघर्ष किया वह एक मील का पत्थर है।

बाबा साहब को अंत-आते तक इस प्रभुत्व का अहसास हो गया था। उन्होंने संविधान निर्मात्री सभा की बैठक में संविधान की तीसरी रीडिंग के समय हुई बहस का उत्तर देते हुए कहा था, ‘‘26 जनवरी, 1950 को हम अंतर्विरोधों के जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीतिक जीवन में हम समान होगे परंतु आर्थिक जीवन में असमानता बरकरार रहेगी। राजनीति में हम एक व्यक्ति एक वोट और एक मूल्य के सिद्धांत को महत्व देंगे। लेकिन सामाजिक और आर्थिक ढांचे के कारण हम अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में हम एक व्यक्ति और एक मूल्य के सिद्धांत को लागू करने के लिए तैयार नहीं होंगे।.....जितनी जल्दी संभव हो हमें इस अंतर्विरोध का हल निकाल लेना चाहिए वरना जो असमानता से पीड़ित हैं वे राजनीतिक जनतंत्र के इस ढांचे को तोड़कर रख देंगे।’’ इस तरह भारत में 1947 के बाद जो राज्य वजूद में आया वह एक ब्राह्मणवादी हिन्दू राज्य था। इसने पुरानी सत्ता संरचना को कुछ हेर फेर के साथ न केवल बरकरार रखा बल्कि इसे और मजबूत बनाकर तमाम सामाजिक रुढ़ियों का इस्तेमाल किया।

जाति के प्रश्नों से घिरे भारतीय कम्युनिस्ट

भारत में कम्युनिस्टों ने शुरू से ही जाति के सवाल को यांत्रिक रुप से समझा। उन्होंने जाति और वर्ग को समरुप मान लिया। इसके अलावा तेलंगाना के संघर्ष को वापस ले लेने के बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने कांग्रेस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और उसने कांग्रेस के उपनिवेषविरोधी संघर्ष को राष्ट्रीय आंदोलन की संज्ञा दे दी। इसके एवज में पार्टी से प्रतिबंध वापस लिया गया और इनके लिए संसदीय चुनाव में शामिल होने को छूट दी गयी। इसने भारत में जातिवादी व्यवस्था को लेकर कोई ठोस समझ विकसित नहीं की। इसने वर्ग को यांत्रिक रुप से समझते हुए जाति को महज ऊपरी ढांचे के सवाल के रुप में समझा जो वर्ग के खात्मे के साथ स्वतः ही लुप्त हो जाएगी। इसने ब्राह्मणवाद के उत्पादन के साथ गंठजोड़ को भी ठीक से नहीं समझा और इस तरह इसने इसके सामंतवाद और बड़े पूंजीपतियों के साथ गंठजोड़ को भी नहीं देखा। ऐसे में जाति उन्मूलन आंदोलन में इसने अपनी कोई भूमिका नहीं देखी। इसके अलावा, इसने कांग्रेस के राष्ट्रवाद को प्रगितिशील और इसके दूसरे हिस्से के रुप में विकसित हुए हिन्दू राष्ट्रवाद को प्रतिगामी माना। इस प्रकिया में कम्युनिस्टों ने हिन्दू राष्ट्रवाद के बनिस्पत कांग्रेसी राष्ट्रवाद को ही जनता का राष्ट्रवाद करार दे दिया। उन्होंने इस तथ्य की भी अनदेखी की कि हिन्दू राष्ट्रवाद और कांग्रेसी राष्ट्रवाद एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और हिन्दू राष्ट्रवाद कांग्रेसी राष्ट्रवाद की ही स्वाभाविक परिणति है। हद तो तब हो जाती है जब ये कम्युनिस्ट नामधारी पार्टियां गांधी, नेहरु और कांग्रेस में तो प्रगतिशीलता ढूंढ लेती हैं लेकिन सामाजिक उत्पीड़न के खिलाफ आंदोलनों में केवल जातियता के तत्व ही ढूंढ पाती हैं।

जाति की मार्क्सवादी समझ

भारत में कम्युनिस्ट नामधारी पार्टियों ने जाति के सवाल पर जो दिशा अपनायी उससे यह सन्देश गया कि मार्क्सवाद वर्ग के नाम पर जातीय उत्पीड़न के सवाल को कोई तवज्जो नहीं देता। इसने एक हद तक उत्पीड़ित जातियों, उत्पीड़ित अस्मिताओं और उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं के अंदर कम्युनिस्टों से अलगाव पैदा किया। जबकि यह सच नहीं है कि मार्क्सवाद उत्पीड़ित अस्मिताओं के बारे में कोई बात नहीं करता। सोवियत संघ में क्रांति के सामने एक औद्योगिक देश में उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं का तो सवाल था लेकिन वहां की क्रांति को जाति जैसे सवाल का सामना नहीं करना पड़ा था। चीन की क्रांति ने एक खेतिहर और पिछड़े देश में जनता की मुक्ति के सवाल को काफी बेहतर तरीके से समझा जो पिछड़े देशों में सामाजिक रुपांतरण और इसकी गत्यात्मकता को समझने में एक महत्वपूर्ण अनुभव प्रदान करती है। चीन में कन्फयूषियस का प्रभाव जरुर था लेकिन इसकी जटिलतायें और मजबूती ब्राह्मणवाद की तरह नहीं थीं।

भारत में कम्युनिस्टों ने एकदम शुरू से ही भारतीय सामंतवाद की विशिष्टता को नहीं समझा। भारत का सामंतवाद यूरोप के सामंतवाद से भिन्न था। भारतीय सामंतवाद दास समाज से उभरे यूरोपिय सामंतवाद से भिन्न ब्राह्मणवादी जाति व्यवस्था से जुड़ा रहा है। भारत में सामाजिक रुपांतरण की किसी भी कोशिश को समाज की बाह्मणवादी संरचना से जूझे बगैर आगे ले जाना मुश्किल है। मार्क्सवाद कोई रुढ़ और जड़ सामाजिक विज्ञान नहीं है। यह सच है कि मार्क्सवादियों के शुरूआती अनुभव यूरोप के औद्योगिक देशों में मजदूरो के मुक्ति संघर्षों से हासिल हुए थे जहां सामंतवाद के अंदर शोषण का स्वरुप मूलतः वर्गीय था। चीन जैसे पिछड़े देश में क्रांति ने यूरोप के इस अनुभव को पिछड़े देशों में मुक्ति संघर्ष के अनुभव से समृद्ध किया और दुनिया में आनेवाली क्रांतियां भी पिछली क्रांतियों को उसकी सीमाबद्धताओं से और आगे ले जायेंगी।

तमाम मार्क्सवादी शिक्षकों की रचनाओं पर गौर करें तो इसका सार यही है कि वर्ग संघर्ष में शोषण और उत्पीड़न के सारे पहलुओं को समेटा जाए। यह उत्पीड़न आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और लैंगिक कोई भी हो सकता है। भारत जैसे देश में जहां तकरीबन तीन चैथाई आबादी किसी न किसी तरह जातिगत उत्पीड़न का सामना करती है और लगभग पांचवां हिस्सा सीधे तौर पर सबसे घृणित उत्पीड़न छुआछूत का सामना करता है, जातीय उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष को वर्ग संघर्ष का एक हिस्सा बनाना ही होगा। समाज में गहरे रुप से जमी ब्राह्मणवादी विचारधारा के खिलाफ संघर्ष को भी हमें गम्भीरता से लेना होगा। जब तक आम जनता सामन्ती सोच से ग्रसित रहेगी, जिसका एक महत्वपूर्ण पहलू जाति है, तब तक कोई सच्चा परिवर्तन नहीं हो सकता।

वास्तव में सच्ची वर्गीय एकता हासिल करने के लिए जातीय भेदों तथा उच्च जाति के पूर्वाग्रहों की समस्त अभिव्यक्तियों को ध्वस्त करना होगा। यहां के तथाकथित मार्क्सवादियों ने संगठनों में जातिगत भेद और श्रेष्ठता के पूर्वाग्रहों पर कभी गौर नहीं किया। इन पहलुओं पर गौर किये बिना वर्गीय एकता को पुख्ता नहीं बनाया जा सकता है। श्रेष्ठता के जातिगत पूर्वाग्रह और जातीय अलगाव दोनों ही यथार्थ हैं। इनसे चाह कर भी बचा नहीं जा सकता है। हमें बचने के बजाय इनसे लड़ना ही होगा।

मार्क्सवादी खेमे में हमेशा यह सवाल उठाया जाता रहा है कि जातिगत उत्पीड़न के सवाल को उठाने से श्रमिकों के बीच विभाजन पैदा हो जाएगा जबकि सच तो यह है कि श्रमिक तो पहले से ही विभाजित हैं। अंबेदकर ने कहा था जाति व्यवस्था ने सिर्फ श्रम विभाजन नही, श्रमिकों के बीच भी विभाजन पैदा किया है। यह दरअसल एक उच्च जातीय मानसिकता ही है जो न केवल व्यापक जनता को मुक्ति संघर्ष से अलगाव में डालती है बल्कि न्याय के सवाल को भी नुकसान पहुंचाती है। भारत में कम्युनिस्टों में जाति के सवाल पर 1970 के दशक के उतरार्द्ध में बहस तेज हुयी और इसने मार्क्सवादी विमर्श में अपनी जगह बनायी। जाहिर तौर पर नक्सलवादियों के कुछ धड़ों ने जाति के सवाल पर पुराने नजरिए की आलोचना करते हुए नए दृष्टिकोण की वकालत की। इन्होंने पुराने मार्क्सवादियों की समझ की आलोचना करते हुए कहा कि जाति और वर्ग समरुप नहीं हैं इसलिए महज वर्ग के खात्मे से ही जातियों का भी उन्मूलन नहीं हो जाएगा। इनका मानना था कि जाति महज ऊपरी संरचना का सवाल नहीं है बल्कि ब्राह्मणवाद से बंधे होने की वजह से भारत में जाति का सवाल आधार और ऊपरी ढांचे दोनों का सवाल हो गया है। इसका मतलब यह था कि उत्पीड़ित जातियों की मुक्ति आर्थिक और सामाजिक दोनों संघर्षों में ही निहित है। इसने यहां तक कहा कि भारत में जाति के सवाल पर संघर्ष कांतिकारी संघर्ष के साथ-साथ चलाना होगा। इस धड़े का मानना था कि जाति व्यवस्था भारतीय समाज में मेहनतकश जनता के शोषण और उत्पीड़न का एक महत्वपूर्ण औजार रहा है। इसने सामाजिक सुधार आंदोलनों के सकारात्मक पक्ष को भी स्वीकार किया। यहां यह कहना आवश्यक होगा कि यह दृष्टि एक छोटी धारा में प्रभावी हुई और काफी बिलम्बित थी।

क्या एक ब्राह्मणवादी राज्य में समानता संभव है?

जब हम ब्राह्मणवाद को शोषण के तंत्र के रुप में देखते हैं तो यह अपने कुछ खास तरीकों से काम करता है। इसमें एक तरफ यह जातीय गठन में सबसे निचले पायदान पर माने जाने वाली जातियों को उत्पादन के स्थायी साधनों से मरहूम करता है वहीं शारीरिक श्रम और सबसे खराब समझे जाने वाले काम को उत्पीड़ित जातियों का काम समझता है। इसलिए ब्राह्मणवाद से मुक्ति का सवाल अंतिम रुप से उत्पादन संबंधों में बदलाव का सवाल और शारीरिक और मानसिक श्रम के बीच विभेद को खत्म करने का सवाल है। आज भी कुछ पारंपरिक मार्क्सवादी शारीरिक और मानसिक दोनों श्रम की बराबरी का तर्क गढ़ने के लिए मार्क्स के उद्धरणों का इस्तेमाल करते हैं। दरअसल वे यह नहीं समझते कि भारत में मानसिक श्रम सर्वोच्चता का बोध लिए रहा है जिसमें उत्पीड़ित जातियों के प्रवेश की मनाही रही है। इसलिए मानसिक श्रम पर से एकाधिकार को तोड़ना और मानसिक श्रम में बैठे लोगों को भी शारीरिक श्रम में लाना दरअसल भारतीय समाज के व्यापक जनवादीकरण का हिस्सा है। जहां तक जातियो की बराबरी का सवाल है तो क्या एक ब्राह्मणवादी समाज में यह संभव है? ब्राह्मणवादी व्यवस्था जातीय स्तरीकरण के बिना जिंदा नहीं रह सकती। एक ब्राह्मण के बने रहने की बुनियादी शर्त है कि जातीय स्तरीकरण में सबसे निचले पायदान पर जीने वाले लोगों का भी वजूद रहे। इसलिए यह संभव नहीं है कि इस व्यवस्था में ब्राह्मण और दलित दोनों ही समान अधिकार के साथ अपना वजूद बनाए रहें। जब तक जातिगत पूर्वाग्रह मौजूद रहेंगे और जातीय चेतना तथा पहचान बनी रहेगी तब तक समाज का सच्चा जनतांत्रिकरण नहीं हो सकेगा। जब तक प्रत्येक जाति खुद को अपने से नीचे वाली जाति से श्रेष्ठ समझती रहेगी तब तक अभिजात्य तथा श्रेष्ठता की विचारधारा के स्थान पर समानता की व्यवस्था स्थापित नहीं की जा सकेगी। अगर उत्पीड़ित जातियों और अस्मिताओं को व्यापक जनतांत्रिक अधिकार चाहिए तो इसके लिए एकमात्र विकल्प इस ब्राह्मणवाद का खत्मा और ब्राह्मणवादी हिन्दू राज्य के खिलाफ व्यापक एकजुटता ही हो सकती है जो शोषण के आर्थिक और सामाजिक दोनों स्वरुप के खात्मे की बात करे।

आरक्षण के तीखे होते सवाल

आरक्षण के सवाल पर देश में मुख्यधारा के मार्क्सवादियों से लेकर माले नामधारी पार्टियों की समझदारी को लेकर काफी सवाल उठाये जाते रहे हैं। इनकी समझदारी पर सवाल उठाये जाने की पर्याप्त गुंजाइश भी रही है। जब मंडल कमीशन को लागू करने का सवाल देश में प्रमुखता से उठा तब कुछ मार्क्सवादी संगठनों ने जहां आरक्षण की नीति की खिलाफत की तो कुछ मार्क्सवादी-लेनिनवादी संगठनों ने इस पूरी प्रकिया को आरक्षण समर्थकों और विरोधियों का उन्माद करार दिया और कहा कि हम तो सबके लिए रोजगार की बात करते हैं। वहीं कुछ मार्क्सवादी-लेनिनवादी पार्टियों ने आरक्षण को निष्क्रिय समर्थन देने की घोषणा की। हालांकि एकाद् कम्युनिस्ट धड़े ने ही न केवल आरक्षण को बिना शर्त समर्थन की घोषणा कि बल्कि व्यापक आम जनता और जनपक्षीय संगठनों को आरक्षण विरोधियों के उन्माद की खिलाफत करते हुए सड़कों पर उतरने की अपील की। आरक्षण की सीमाबद्धता के सवाल के जबाब में इसका कहना था कि अभी आरक्षण की सीमाबद्धता पर सवाल करने का वक्त नहीं है बल्कि इसकी सीमाबद्धताओं को हम समय पर जनता के बीच ले जायेंगे। यह बुनियादी रुप से न्याय और हिस्सेदारी का सवाल है।

आज फिर आरक्षण पर कई तरह से सवाल उठाये जा रहे हैं। कुछ लोग आर्थिक आधार पर आरक्षण का सवाल उठा रहे हैं तो कुछ लोग संविधान का हवाला देकर आरक्षण की समीक्षा की बात उठा रहे है। कुछ लोग मेरिट का आधार बनाकर आरक्षण का विरोध करते हैं तो कुछ लोग क्रीमी लेयर का सवाल उठा रहे हैं। अगर इन तमाम लोगों के तर्कों पर गौर किया जाये तो इन तमाम सवालों के केन्द्र में उच्च जातीय मानसिकता ही काम कर रही होती है। मजेदार बात यह है कि जो लोग मेरिट और समान अवसर का सवाल उठाकर आरक्षण का विरोध करते हैं वे तमाम लोग बिना शर्त महिला आरक्षण का समर्थन करते है। यहां मेरिट और समान अवसर पर चलीं तमाम बहसें अचानक गायब हो जाती हैं।

इन उच्च जातीय पूर्वाग्रहों को बेनकाब करते हुए सबसे पहले तमाम लोगों को यह समझाये जाने की जरुरत है कि आरक्षण का सवाल अमीरी-गरीबी के बीच खाई पाटने का सवाल नहीं है बल्कि सामाजिक न्याय और हिस्सेदारी का सवाल है। दूसरी बात यह है कि आरक्षण की बहस देश में शुरू ही तब की गयी जब देश में सार्वजनिक उपक्रमों को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी चल रही थी। इसका मतलब यह है कि सरकारी नौकरियों में कटौती हो रही थी और इसकी बुनियाद पर निजी क्षेत्र खड़ा हो रहा था। आज बड़े पैमाने पर रोजगार का क्षेत्र निजी क्षेत्र हो गया है ऐसे में आरक्षण की समीक्षा के बजाए निजी क्षेत्रों में आरक्षण का सवाल एक महत्वपूर्ण एजेंडा हो गया है। इसके अलावा आरक्षण विरोधियों को यह भी बताये जाने की जरुरत है कि जबतक समाज में जातिगत भेदभाव मौजूद हैं, इससे फर्क नहीं पड़ता कि किसी पद पर बैठने वाला व्यक्ति क्रीमी लेयर से आया है या फिर गरीब वर्ग से। इसके अलावा यदि आरक्षण का प्रावधान गरीबी के आधार पर किया जाए तो क्या इसका परिणाम यह नहीं होगा कि जहां निम्न स्तर की नौकरियों में पहले की ही तरह दलित होंगे जबकि उच्च पदों पर जाने की हालत में कोई गरीब दलित नहीं होंगे। क्योंकि आज के समय में पढ़ाई का भारी खर्च उठाना एक गरीब के बूते की बात नहीं है। ऐसे में उच्च पदों पर आरक्षण का क्या कोई मतलब रह जायेगा? इसके अलावा क्या यह भी सच नहीं होगा कि इन उच्च पदों पर गरीब सवर्णों के बजाये अमीर सवर्ण ही जायेंगे तब अमीर सवर्णों की जगह अमीर दलितों के जाने से इतना चिल्ल-पौं क्यों मचाया जा रहा है? सच तो यह है कि रोजगार के लगातार घटते अवसर के सवाल को दूसरी दिशा में मोड़ने के लिए सरकार पूरी बहस को आरक्षण की समीक्षा की तरफ मोड़ रहीं है।

जनतंत्र के लिए संघर्ष ही असली कुंजी

जाति उन्मूलन आंदोलन के बारे में देश में मूलतः दो समझ थी। एक तरफ मुख्यधारा के मार्क्सवादी थे जिनका मानना था कि जाति महज सामंती अवशेष है और वर्ग संघर्ष की प्रकिया में वर्ग के खात्मे के साथ यह स्वतः ही समाप्त हो जाएगी। दूसरी तरफ जाति अस्मितावादी थे जो महज जातीय एकता के जरिए सामाजिक रुप से मुक्ति का सवाल उठाते थे और इस तरह एक जाति के अंदर वर्गीय विभाजन और शोषण के सवाल की अनदेखी करते थे। इसके अलावा ये जातीय शोषण का ब्राह्मणवादी हिन्दू राज्य के साथ संबंधों को भी नहीं देखते थे। इस तरह ये दोनों ही अंतिम रुप से जातीय उन्मूलन के संघर्ष को ही नुकसान पहुंचा रहे थे। इन दोनों के पारंपरिक नेतृत्व को चुनौती देते हुए 1970 के उतरार्द्ध में जहां पारंपरिक मार्क्सवादियों के बीच से क्रांतिकारी कम्युनिस्टों की एक धारा विकसित हुयी वही पारंपरिक अस्मितावादी संगठनों में से ही दलित पैंथर्स का विकास हुआ। जहां क्रांतिकारी कम्युनिस्टों ने जातीय उन्मूलन के संघर्ष को जनता की व्यापक मुक्ति से जोड़ा और जाति विरोधी संघर्ष को वर्ग संघर्ष का एक हिस्सा माना वहीं दलित पैंथर्स ने जातीय उन्मूलन के आंदोलन को ब्राह्मणवादी सत्ता के खिलाफ आंदोलन से जोड़ा। इन दोनों आंदोलनों का हस्र चाहे जो भी हुआ हो, इनके अनुभव निश्चय ही आगे के तमाम आंदोलनों के लिए बहुमूल्य सिद्ध होंगे।

जहां तक जातीय उन्मूलन और समाज के व्यापक जनतांत्रिकरण का सवाल है तो जाहिर तौर पर यह ब्राह्मणवादी हिन्दू राज्य के खिलाफ संघर्ष के जरिए ही आगे बढ़ाया जा सकता है। इसके अलावा हमें उत्पीड़ित जातीय गोलबंदी और उच्च जातीय गोलबंदी में भी फर्क करके देखना होगा। जहां उत्पीड़ित जातियों की गोलबंदी में उत्पीड़न से मुक्ति के तत्व अंतर्निहित होते हैं वहीं उच्च जातियों की गोलबंदी में अपने प्रभुत्व को बचाए रखने का तत्व बरकरार रहता है। इस तरह उत्पीड़ित जातियों की एकता में जनतंत्र की आकांक्षा होती है वहीं उच्च जातियों की गोलबंदी में प्रभुत्व को बचाए रखने की लिप्सा। इस तरह मार्क्सवादियों को दोनों जातीय गोलबंदी को बराबर करके देखने के बजाए उत्पीड़ित जातियों की गोलबंदी के जनवादी तत्व का समर्थन करना चाहिए। जहां तक अस्मितावादियों का सवाल है तो उन्हें भी इस बात से सबक लेना चाहिए कि किस तरह दलितों और पिछड़ों के लिए आरक्षण मांगने वाले सत्ता में जाते ही उंची जातियों के लिए आरक्षण मांगने लगते हैं। बिहार और यूपी में दलितों और पिछड़ों के नाम पर राज करने वाली पार्टियों ने ही सबसे पहले सवर्णों के लिए आरक्षण का सवाल उठाया। दलित और पिछड़ों के नाम पर राज करने वाले लोगों के दौर के अनुभव को भी तमाम अस्मितावादियों को समझना चाहिए। इस ब्राह्मणवादी हिन्दू राज्य ने रोहित की भाषा में हमें एक इंसान से महज एक वोट में बदल दिया है।

दरअसल हमें समझना पड़ेगा कि ब्राह्मणवाद एक सत्ता संरचना है जिसमें जाकर एक उत्पीड़ित अस्मितावादी भी खुद उस तंत्र का एक हिस्सा बन जाता है और अंततः ब्राह्मणवादी सत्ता तंत्र को ही मजबूत करता है और हरेक इंसान के वोट बना देने के हिसाब किताब में मशगूल हो जाता है। ऐसे में इन दोनों आंदोलनों को अपने बनाए घेरे से निकल समाज के व्यापक जनतांत्रिकरण के संघर्ष में समान दुश्मन के खिलाफ तमाम जनवादी आंकाक्षा वाले संघर्षों को गोलबंद होगा।

हम जिस दौर में जी रहे हैं वह लगातार प्रतिरोध के दौर में तब्दील होता जा रहा है। प्रतिक्रिया की तमाम शक्तियां जहां बेलगाम हो रही हैं वहीं जनतांत्रिकरण संघर्षों में भी उछाल देखा जा रहा है। आज के दौर में जहां कई मिथक और भ्रम टूट रहे हैं वहीं नया परिदृष्य और ज्यादा स्पष्ट होता जा रहा है। रोहित वेमुला ने अपनी शहादत के जरिए संघर्ष के एक नए स्वरुप को जन्म दिया है और स्पष्ट किया है कि अब हम महज एक वोट बने रहने के लिए तैयार नहीं है। आइए, हम संघर्ष और एकता के इस नए दौर का स्वागत करें!

(सबाल्टर्न से साभार)

लेखक पटना विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के शोधार्थी हैं.