(आलोचना) अल्पविचारित कवि और साहित्यिक सुयोग्यता – सुधीर रंजन सिंह

साहित्यिक सुयोग्यता सामान्य रूप से कृति के प्रति पाठकों के परम्परागत रुख से तय होती रही है। कविता की रूढ़ियाँ, प्रतीकों के तर्क, बिम्ब-सुघड़ता और काव्यात्मक प्रभावशीलता के लिए किए गए सुनिर्धारित प्रयत्नों को आधार बनाकर अच्छे-बुरे का निर्णय लेना एक आम तरीका है। यह काव्यषास्त्रीय निर्धारण है, और इसका अपना महत्त्व है। लेकिन काव्य-रचना में और बातें भी महत्त्व रखती हैं। वस्तुतः कविता अधिक जटिल और समस्यापूर्ण मामला है। इसलिए कई कवि काव्योचित प्रणाली के प्रति उच्छृंखलता और अनाड़ीपन के बावजूद सुयोग्य माने जा सकते हैं। उनकी कविताएँ काव्यशास्त्रीय निर्धारण के समक्ष समस्या के रूप में उपस्थित होती हैं। वह अपने समय की पाठकीय ‘माँग’ को भले पूरा नहीं करतीं, लेकिन उस ऐतिहासिक समस्या से जुड़कर, जिसमें रचनाशीलता ही संकट में होती है, एक ज़रूरी आयाम पैदा करती हैं।

‘‘कला में जो मनमानापन और अपरिपक्वता दिखाई पड़ती है’’, जैसा कि वाल्टर बेंजामिन ने लिखा है, ‘‘खासकर तथाकथित पतनशील युग में, वस्तुतः वह कला के केन्द्र की ही समृद्ध ऐतिहासिक ऊर्जा से उद्भूत होती है।’’1

सातवें दशक में कविता में अनोखी कार्रवाइयाँ देखने को मिलीं। अकविता और नक्सल कविता जैसी दो मुख्य कोटियाँ बन गईं थीं। अराजक और आक्रामक! कविता के केन्द्र पर आघात से नई बात पैदा की गई। आज उसमें आकर्षण नहीं बचा है। लेकिन इतने सालों बाद सोचने की ज़रूरत है कि केवल इन्हीं दो कोटियों में बँटे राजकमल चैधरी, धूमिल, सौमित्र मोहन, कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह, आलोकधन्वा, जैसे कवि ही, जिन पर पर्याप्त विचार हुआ, इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण थे या उस समय के दूसरे कवि भी। बाद में चन्द्रकांत देवताले, रमेशचन्द्र शाह, विनोदकुमार शुक्ल, लीलाधर जगूड़ी और विष्णु खरे को पर्याप्त ख्याति मिली। इनकी कविता में सातवें दशक वाली बात बिल्कुल अनपुस्थित नहीं, लेकिन कम थी। काव्योचित आग्रह इनमें पर्याप्त था। उसी दौर के कवि जितेन्द्र कुमार, आग्नेय और विनय दुबे हैं। विनय दुबे बाकी से सात-आठ साल छोटे हैं। लेकिन समय उनका वही है। ये कवि काव्यात्मक प्रभावशीलता के प्रति कम सचेष्ट हैं। इनकी मुद्रा किंचित ग़ैरजवाबदेह है, किन्तु उसमें एक विशेष ‘ऐतिहासिक ऊर्जा’ है। ये अल्पविचारित कवि हैं। इन पर सोचने का अवकाश तैयार किया जाना चाहिए।

सबसे पहले जितेन्द्र कुमार, जो 1958 से कविता लिख रहे थे। ‘पहचान’ शृंखला में उनकी एक कविता (1958) है:

मेरे हृदय में ताड़ का एक वृक्ष था

और वह ताड़ का वृक्ष था

लम्बा और शान्त,

और उसकी पत्तियाँ नोकीली थीं

चाकू के फलों की तरह!

जब वे चाकूल पत्तियाँ

अपने नोकीले फलों के साथ मेरे करीब आईं -

उन्होंने मुझे फूलों सा छुआ -

और मैंने खुद को माँ के बगल में

रोते हुए सुना!

(पहचान: एक/2, पृ.-2)

आदमी के भीतर चाकूल पत्तियाँ भरी हुई हैं। वे भीतर-भीतर उसे जितना काटती हैं, प्रकट होकर जीवन प्रदान करती हैं। जीवन, जिसमें त्रास से मुक्ति नहीं हैं। ब्लैंचोट का एक वाक्य है: ‘‘खतरा यह है कि अनर्थ (डिजास्टर) देह के भीतर अर्थ को घेरे रहता है।’’2 अनर्थ जीतेन्द्र कुमार की देह का स्थायी भाव है, जो अपने अर्थ में त्रासमयी लेकिन जीवनदायी है।

जितेन्द्र कुमार की इस कविता के आसपास की ही आग्नेय की एक कविता है: ‘विष-पुत्र’।

प्रकाश के वृत्त में

एक फूली डाल पकड़े

हरे पत्तों वाले,

नेत्रों सरीखे देखते हुए

दो हाथ तुम्हारे या मेरी पिपासित

ज़िन्दगी के।

जिन्हें जब ही छूता हूँ

तो सामने का पूरा का पूरा हरा पेड़

सूख जाता है।

(नई कविता, खण्ड-3, पृ.-238)

अनर्थ! हरे पत्ते वाले डालों जैसे हाथ को छूने से पूरा का पूरा पेड़ सूख जाता है (यह प्रेम का प्रतिपाठ है)। अनर्थ!- आदम ने जो किया था उस अर्थ में। आदमी अपनी मूल-वृत्त को ही बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। कामोत्तेजना उसकी ज़िन्दगी के अर्थ को छोटा कर रही है।

अनुपस्थित अर्थ को निगाह में रखने की ज़रूरत है। यह अनर्थ है कि आदमी ‘विष-पुत्र’ हो गया है, उसे अमृत-पुत्र होना था। आग्नेय की कविता अर्थ-विडम्बना में निवास करती है।

अभिव्यक्ति ही विडम्बना है। जितेन्द्र कुमार की कविता इसका उदाहरण है। नहीं कहने की इच्छा के भीतर कहना! एकान्त में धकियाए हुए व्यक्ति के लिए एकान्त ही सुख और गर्व का विषय बन जाए, उस विडम्बना से उद्भूत कविता:

मेरा एकान्त मुझे कसता है

और एक वह केवल मेरा सहचर है

भौतिक वस्तुओं की क्षुद्रता ने

दिए हैं मुझे: पिता और भाई!

खोखला मेरा गर्व मुझे कसता है

और एक वह केवल मेरी माँ है।

(पहचान: एक/2, पृ.-2)

कोई गम्य वस्तु नहीं, जिसे चाहा जा सके। एक अपना गर्व है, वह भी खोखला है; लेकिन उसे छोड़कर कुछ चाहने योग्य भी नहीं। विडम्बना को ही जब कोई जीवन की अन्तर्वस्तु के रूप में स्वीकार करता है तो उसमें वास्तविकता से भिड़ने की योग्यता बढ़ जाती है।

जितेन्द्र कुमार के यहाँ कोई अनुभव वास्तविकता से सामंजस्य बैठाने का नहीं है। वे वास्तविकता को एक संकट के रूप में देखते हैं। संकटग्रस्त अनुभवों का कवि! प्रायः संकट में लोग सत्य का एक डरपोक साथी हो जाते हैं। सामंजस्य बैठाते हुए स्वयं को माफ़ करते रहते हैं। जितेन्द्र एकान्त को चुनते हैं। यह चुनाव भी भिड़ने का एक तरीका हो सकता है:

इतना विकल हूँ

जितनी पूर आई नदी सी हरहराती हवा

आम के बगीचे में होती है

इतना दुख है

कि एक भारी मन सा बीड़ियों का धुँआ

मुझ पर घना होता आता है...

प्रकाश से डरता हूँ

और झुकी आती छत का सहारा ले

रात भर माचिस में जुगनूँ जमा करता हूँ!

(वही, पृ.-4)

पहले विकलता पैदा की गई (यह पागलपन से बचने का एक तरीका है), फिर विकलता को शैशव-स्मृति से जुड़ी क्रियाओं के सहारे वश में करने की कोशिश की गई- ‘रात भर माचिस में जुगनूँ जमा करता हूँ।’ यह अलगाव से मुक्ति का तरीका है।

कवि का एकान्त आरोपित है। अभाव से पैदा हुआ। उसकी इच्छाओं का हनन हुआ है। इसके बावजूद वह अलगाव का शिकार नहीं हुआ। तो यह विडम्बना को झेलने की शक्ति का ही कमाल है।

मैंने अपनाव को समझा वितृष्णा में

जैसे साहचर्य मैंने जाना एकान्त में-

मैं भी हूँ पुरुष

मानव आकांक्षाओं के मुझ पर भी हुए हैं

अनेकों वार

पर स्त्री-सुख जाना मैंने उसके अभाव में!

(वही, पृ.-7)

कामोत्तेजना की यह एकान्त शान्ति समाज पर एक अभियोग है। मनुष्य की नैसर्गिक स्वतंत्रता का हनन! भर्तृहरि ने अनुभव किया था- ‘आलोलायतलोचना युवतयः स्वप्नेऽपि नालिङ्गिताः’ (चंचल बड़ी आँखों वाली सुन्दरियों का सपने में भी आलिंगन नहीं किया)। अभाव की यह पीड़ा पराए कौर की आशा में जीवन बिताने के समान है- ‘कालोऽयं परपिम्डलोलुपतया काकैरिव प्रेर्यते।’

काव्य-रचना इस अर्थ में कृत्रिम है कि वह मूलवृत्तिगत इच्छा की क्षतिपूर्ति है। लेकिन कवि अपने हृदय के विदारित टुकड़ों को कविता के रूप में सजाता है तो उससे अधिक करुण चीत्कार कहीं और पैदा नहीं होती:

हृदय के चिथड़े हुए टुकड़ों को

जब मैंने काव्य सा सँजोया

मुझे लगा पहिन लिया है मैंने अपना ही हृदय

आस्तीन पर

और तब एक रेखा मैंने कविता के आरपार

खींच दी

जो एक शहतीर सी मेरे हृदय को चीरती निकल गई।

(वही)

जितेन्द्र कुमार यहाँ हृदय को आस्तीन पर पहन कर काव्य-कर्म को मनुष्यता के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचा दिया है। इस कविता की पहली पंक्ति है- ‘मैंने काव्य-रचना को सुख का साधन समझा था!’ अन्तिम पंक्ति भी यही है, सिर्फ़ इसमें ‘फिर भी’ जोड़ दिया गया है- ‘मैंने फिर भी काव्य-रचना को सुख का साधन समझा था!’ कविता और हृदय के बीच समीकरण बैठाने में ‘फिर भी’ वाली बात बनी रहती है। एक फाँक बना रहता है। अगर यह न बना रहे तो कविता शिखर पर पहुँचकर भी संन्यासिनी से अधिक कुछ नहीं रहेगी। कविता उद्वेगों का शमन नहीं, उनका अग्निकुंड है।

कविता तोष की वस्तु नहीं, न ही भावनाओं को सुरक्षित रखने की मजबूत पेटी है। वह एक ऐसा अहसास है जिसमें पर्याप्त रूप से कवि की दुर्दशा, उसके जंगलीपन और व्यभिचार का भी आख्यान होता है। दूसरे शब्दों में, कविता, जैसा कि आग्नेय की एक कविता का शीर्षक है, ‘अपने ही खिलाफ’ आख्यान तैयार करने में मदद करती है। इसी बात में वास्तविकता की प्रामाणिक व्याख्या है। दिलचस्प रूप से आग्नेय की कविता इस प्रकार की व्याख्या उलटे सिरे से करती है:

उसके लिए कविता हाथों की सफाई यानी जादू का करिश्मा है

वह अपनी ही लाश अपने कन्धों पर लटकाये

चारदीवारी के अन्दर मर जाने वालों की मौत का मज़ाक उड़ाता है

फिर जब कभी उसके मांस के लम्बे टुकड़े में (पेशिच

से उसकी आतें सड़ चुकी हैं) उत्तेजना थरथराती है

वह लंगूर की तरह अपनी औरत की खाट पर चढ़ जाता है

और उसके जिस्म नोंच-नोंच कर अमरूद की तरह खाता है

वह अपनी कविता का

सही इस्तेमाल करना चाहता है

लेकिन कविता कर लेने के बाद

वह अपने को सुखी संतुष्ट और तनावहीन पाता है।

(पहचान: 4/पृ.-39-40)

‘तनावहीनता’ वास्तविकता के प्रति जुझारूपन को नष्ट करती है। कविता भी इसी मार्ग से नष्ट होती है। कवि दूसरों के व्यभिचार की निन्दा करे और अपने को भाव-सत्ता के उच्च आसन पर बैठाये रहे- यह वही बात है कि कोई अवसरवादी दूसरों को अवसर पाता देखकर गालियों की बौछार करे। कविता को नैतिक भूमि पर न रखकर भी नैतिक प्रश्नों से टकराया जा सकता है। एक तथाकथित पतनशील युग में अपने को पतन की दशा से मुक्त साबित करके सिर्फ़ उपदेशक हुआ जा सकता है। पतन का साथी होकर अनुभव करना कि धोखा हुआ है, स्वयं में उसके खिलाफ एक वाजिब कार्रवाई है।

आग्नेय की पीढ़ी यौनाक्रान्त रही। अकविता पहचानी गई थी इसी बात से । आग्नेय ने यौनाक्रान्तता को आत्मालोचना के रूप में अपनाते हुए उससे मुक्ति का मार्ग निकाला। अपनी पीढ़ी से, यह आवश्यक भी था, वैचारिक सहमति बनी रही, ‘‘कविता हमारे लिए भावनाओं का मायाजाल नहीं है।’’3 इस तरह इस पीढ़ी और आग्नेय की कविता वही नहीं है जो छायावाद से लेकर ‘नई कविता’ तक की कविता रही है।

वह जीवन भर

मनुष्य को

पत्तों, फूलों और फलों से लदा हरा वृक्ष

समझता रहा

वह जीवन भर

समझता रहा

तितलियों, मधुमक्खियों और

करमकल्ले

सब सुरक्षित हैं

सुरचित कविता में,

जबकि मनुष्य खड़ा है

अपने दोनों हाथ ऊपर उठाए

उसे ही कल

वधिक तक पहुँचाया जाएगा।

(मेरे बाद मेरा घर, पृ.-41)

‘सुरचित कविता’ से अलग होना एक आँवागार्द कला है। लेकिन आग्नेय तक आकर, यह कहे जाने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, आँवागार्द कला अपना आकर्षण कम कर चुकी है। उसमें थोड़ी फार्मूलाबद्धता आ गई है।

जितेन्द्र कुमार तीव्रतम अनुभूति के कवि हैं। भीतरी तनाव से त्रस्त, वास्तविकता पर प्रहार करती हुई एक चेतना, जिसमें मृत्यु सर्वथा उपयुक्त विषय के रूप में उपस्थित होती है। दूसरे शब्दों में, जब मृत्यु दिखाई पड़ती है तभी चेतना की गति तीव्र होती है। वास्तविक ज़िन्दगी की निष्चेटता का बड़ा उत्तर है मृत्यु!

जीवन की कगार पर

मैं मरूँगा

सूखे

बिलबिलाते हुए

पत्ते सा

आकाश लटकी रही

चिड़िया सा

जो पंख समेटे

सीधी

धार की गहराई पर गिरती है

मैं मरूँगा

जब जीवन को अर्थ देना

ज़रूरी हो जायेगा।

(ऐसे भी तो संभव है मृत्यु, पृ.-25)

नहीं कहने की इच्छा के भीतर कहना- जैसा कि हमने जितेन्द्र कुमार के लिए पीछे कहा- मृत्यु के सम्बन्ध में उनकी कविता में वही बात नहीं है। इस विषय पर वे कहने की शुद्ध इच्छा के कवि हो जाते हैं। साक्षात्कार एक ज़रूरी विषय है। कविता होती ही है अद्वितीय विषय के साक्षात्कार के लिए- मनोव्यथा के भीतर अराजक और अभिमानी होने के लिए; प्रेम की सुपरिचित परिभाषाओं को लाँघ जाने के लिए; और, स्वेच्छित मृत्यु के साक्षात्कार के लिए। जितेन्द्र कुमार की कविताएँ इसी धारणा से लिखी गई हैं। उनकी कविता में प्र्रेम, व्यथा और मृत्यु की एक संश्लिष्ट चेतना है।

वक्त की पेचीदगियों में

लोग

मेरी बाट जोह रहे होंगे

रफ्ता-रफ्ता

दर्द की दीवारें दीख पड़ेंगी

बसे मकानों की स्तब्धता

कानों के भीतर सुन पड़ेगी

तब बिंधने को मजबूर मेरा चेहरा

अपनी हथेलियों में भरकर वह कहेगी

आओ

मैं कब से तुम्हारी बाट में

खड़ी हूँ

मृत्यु का द्वार

प्रेम के नज़दीक ही तो

खुलता है

(वही, पृ.-22)

रोमांस-मुक्त प्रेम, विषाद-मुक्त मृत्यु! न मुठभेड़, न उत्सर्ग! जीवन-द्रव का अंग जैसे प्रेम, वैसे ही मृत्यु! मृत्यु-अनुराग की कविता! यह हमें सोच में डाल देती है। पुनः हमें ब्लैंचोट का एक वाक्य याद आ रहा है- ‘‘लेखक, उसकी जीवनी: वह मरा, जीवित हुआ और मरा।’’4

काव्य-अनुभव की गहनता मृत्यु-अनुभव के सदृश है। जिसका अर्थ ‘समाप्ति’ है, वही सप्राण उपस्थित (लाइव्ड) हो- इस बात में जीवन और कविता, दोनों की अद्वितीयता है।

अपनी मृत्यु के बारे में सोचना यानी मृत्यु का साक्षात्कार जितेन्द्र की कविता की जान है। यह साक्षात्कार ‘आत्मश्लाघा’ है- मृत्यु अक्षरशः मृत्यु नहीं, वह नार्सिसिस्टिक चेतना है।

नार्सिसिस्टिक चेतना बिल्कुल ख्याली नहीं होती। दुनिया की बातों को अपने अनुभव में उतार नहीं पाने की बेचैनी से पैदा होती है। जितेन्द्र कुमार सामाजिक-राजनीतिक बोध की दृष्टि से कुंठित और असफल रहे। व्यभिचार-चेतना उनपर सवार रही। वीभत्स रुचियों ने बड़ा दायरा बना लिया। क्षरण और पराजय के लिए अपने को विवश पाया। ऐसे में उनके लिए सृजना का बड़ा और निर्दोष विषय मृत्यु ही हो सकती थी।

कोई कवि, लम्पटपन के बावजूद, मृत्यु को निमंत्रित करती हुई छवि गढ़ने में कामयाब रहे, यह कम श्लाघ्य नहीं है।

आग्नेय मूलतः प्रेम को निमंत्रित करने के कवि हैं। प्रेम को निमंत्रित करने के ही, प्रेम पाने के नहीं। ‘आदमी का अकेलापन’5 और उसकी यौनाक्रान्तता लम्बे समय तक आग्नेय का पीछा करता रही है। ‘पहचान’ शृंखला से लेकर ‘सिरहाने मीर के’ तक। शुरू की कविताओं में जितेन्द्र कुमार और अकविता के समान ‘वीभत्स’ भी है:

उदार प्रेम, तटस्थ प्रेम की व्याख्या से रचा मेरा जीवन

काम-युद्ध की ज्वाला में भस्म हो गया है।

और तभी मैं अपनी कविताओं के मुख से

प्रेम की काल्पनिक स्त्री के स्तनों को

काटता

पृथ्वी को वेश्या, वेश्या उच्चारित करता हूँ।

(पहचान: 4/पृ.-13)

अभाव से पैदा हुआ पागलपन! यह कविता के लिए जायज स्थिति नहीं है। लेकिन अभाव के भीतर कोई बड़ा काम कर दिखाने की प्रेरणा छुपी होती है। यह काम जितेन्द्र कुमार मृत्यु का साक्षात्कार करके करते हैं, और आग्नेय कुछ अनूठी प्रे्रम-पंक्तियाँ रच कर।

हृदय का एक आकाश होता।

तुम्हारा चन्द्रमुख स्मरण आने पर

मैं उसमें उड़ते पक्षियों की संख्या

गिनता।

(पहचान, 4/पृ.-8)

पेड़ों की डालों से हरी चिड़ियों का

यकायक उड़ते जाना

तुम्हारी अनुपस्थिति का रोमांचकारी अनुभव

आकाश के बेहद नीलेपन का

क्रमशः उतरते जाना

तुम्हारे नेत्रों का प्रगाढ़ रंग

कठोर प्रेम की प्रतीक्षा जलधाराओं का

लयात्मक बहते जाना

तुम्हारे हाथों का संगीतमय स्पर्श

अग्नि-दृश्यालेखों में मेरे अस्तित्व का

सम्पूर्ण पिघलते जाना

तुम्हारे शरीर का मनोहर उत्सव

(वही, पृ.-20-21)

प्रेम आए, दुःख विदा ले जल्दी से जल्दी। यह न्यूनतम मानवीय माँग है और कविता की ज़रूरी शर्त। जो भी इसकी विकलता दिखाता है, उसकी कविता के साथ न्याय होना चाहिए। भले लोगों की भली-भली एकरस ज़िन्दगी जीने वालों की इस दुनिया में प्रेम की एकाकी अनुभूति भी कम सच्ची और हृदयग्राही नहीं है। इसी से चीज़ों में गरमाहट पैदा होती है। प्रतिरोध का साहस पैदा होता है। न्याय के विचार पैदा होते हैं। इस दृष्टि से आग्नेय की ‘थका प्रेम’ कविता उल्लेखनीय है।

क्या कभी ऐसा समय आएगा

जब लोग स्वयं अपने को

नियुक्त करेंगे न्यायाधीश

दण्डित करेंगे अपने को

पड़े रहेंगे एकाकी परित्यक्त

सीलन भरे अँधेरे तहखानों में

भोगते रहेंगे असीम यातना

जीवन के अन्त तक

देखते रहेंगे एक ही स्वप्न बार-बार

जिसमें आता रहेगा याद

देर से आता हुआ थका प्रेम

और कोई पुराना दुःख

जो भी नहीं अभी तक गया होगा

(सिरहाने मीर के, पृ.-26)

आग्नेय की कविता में, हम पीछे कह चुके हैं, अनुपस्थित अर्थ को निगाह में रखने की ज़रूरत है। हाल की उनकी कविताओं पर हमारा ध्यान गया तो इस चीज़ की खास ज़रूरत महसूस हुई। एक कविता है ‘आत्महत्या का पक्ष’। इसकी हम थोड़ा विस्तार से व्याख्या करना चाहेंगे।

अब ऐसा कुछ नहीं बचा जीवन में

सब कुछ बीत चुका है जीवन में

ऐसा कुछ नहीं होने वाला है जीवन में

हो चुका नहीं पहले जीवन में

(पहल: 85, पृ.-197)

ये निराशा से पैदा हुई पंक्तियाँ हैं। कुछ नहीं बचा, सब कुछ बीत चुका, आगे भी वैसा कुछ नहीं होना जो पहले नहीं हुआ। यह भी सच है कि यह निराशा पूरी सचाई के साथ प्रकट हुई है, लेकिन प्रत्येक पंक्ति में ‘जीवन’ की आवृत्ति किसी और ही सच का बयान है। यानी सबके बावजूद और सबसे ऊपर जीवन है। जीवन से गहरे लगाव के कारण ही निराशा पैदा हुई है। वास्तव में यह जीवन के प्रति दृढ़ आकर्षण की कविता है।

आगे की पंक्तियाँ हैं:

ऊब चुका हूँ प्रार्थनाओं, आह्वानों

चीखों और पुकारों से

जर्जर मन, कमीनी काया और वीरान आत्मा

की कारगुजारियों से

आतंकित हूँ।

(वही)

यहाँ अस्वस्थ मनोभावों की अभिव्यक्ति दिखाई पड़ती है, लेकिन विडम्बक रूप से इसमें स्वस्थ दुनिया की कामना है। ‘ऊब चुका हूँ’ पद से यह बात साफ है। वस्तुतः प्रार्थनाओं, चीख-पुकारों, कमीनी काया और वीरान आत्मा के प्रति यह अवचेतन का रोष है, जो स्वयं कितना निरापद है, उसके बारे में भी सवाल पूछे जाने की भरपूर गुंजाइश है। आगे है:

इश्क के कारोबार में दिवालिया घोषित हो चुका हूँ

उठाईगीर कामनाओं से

टुच्ची महत्त्वाकांक्षाओं से

टुच्ची दुश्मनियों से

टुकड़खोर मित्रताओं से

पिट-पिट कर समतल

हो चुका हूँ।

(वही)

‘अब ऐसा कुछ नहीं बचा जीवन में’ जैसी शुरू की पंक्ति सूत्र है, एफोरिज़्म है; और इस ‘पिट-पिट कर समतल हो चुका हूँ’ में पहुँच कर उसकी विरोधाभास-युक्त व्याख्या हुई है। कवि की गम्भीर शिकायत है उस दुनिया से जिसने उसे समतल बना दिया है। क्या वास्तव में कवि पिट-पिट कर समतल हो गया है? नहीं। उसकी वक्रता बढ़ी है। इसीलिए इस तरह की पंक्ति आ गई है। ‘पिट-पिट कर समतल हो गया हूँ’ की जगह लिखा जा सकता था ‘पिट-पिटा कर टेढ़ा-मेढ़ा हो गया हूँ।’ लेकिन इस आत्मालोचन से कवि बचना चाहता है। बचना चाहता है, बच पाया नहीं है। आगे है:

मैं कनपटी पर तनी

एक भरी रिवाल्वर हूँ

थामे रहोगे मेरा हाथ

कब तक!

(वही)

रिवाल्वर एक जटिल और हिंसक संरचना है। रिवाल्वर कवि खुद ही है और खुद पर तना हुआ भी है। खुद पर ही क्यों, उन पर क्यों नहीं जिन्होंने पीट-पीट कर समतल बनाने का काम किया है? शायद उन पर भी।

मैं कनपटी पर तनी

एक भरी रिवाल्वर हूँ

‘कनपटी’ से पहले ‘अपनी’ सार्वनामिक विशेषण का लोप भाषा की एक ऐसी गलती है, जो अवचेतन-समर्थित है। यह आत्महत्या और हत्या का भेद मिटा देती है। जो आत्महत्या का पक्ष है, वही हत्या का; और दोनों सत्ता-संरचना के ही पक्ष हैं, जिससे कवि अलग नहीं है।

वस्तुतः आत्महत्या का पक्ष अथवा आत्महत्या का चिन्तन, पागलपन के समान अथवा उसी के अंग के रूप में, एक दृष्टि-रूप (फार्म आफ़ वीज़न) है। अपने को नष्ट करने की यह दृष्टि एक चुनाव है। एक ऐसा चुनाव जिसमें वर्तमान समाज के दाँवपेंच और चतुराई से उबरकर मसीहाई गौरव प्राप्त करने की इच्छा है। लेकिन यह इच्छा भी कम विरोधाभासी नहीं है। आखिरी जो पंक्ति है कविता की- ‘थामे रहोगे मेरा हाथ/ कब तक’ उसमें जीवन-राग है। निषेधात्मक बात को सकारात्मक ढंग से हम ग्रहण करें तो इसका यही अर्थ निकलता है। निराला की कविता है ‘युक्ति’:

मोह-पतन में भी तो रहते हैं हम

तम-कण चूम

फिर ऐसी ही क्यों न रहेगी

यौवन-धूम?

(निराला रचनावली, खण्ड-1, पृ.-202)

आत्महत्या के पक्ष में लिखते हुए आग्नेय ‘यौवन-धूम’ से विरक्त नहीं हुए हैं। यही इस कविता की खूबसूरती है।

यह सुरचित कविता है। लेकिन इसे भी हम ‘फिनिश्ड’ कविता नहीं कह सकते। आग्नेय की अवचेतन की फैकिलिटी बड़ी है। अवचेतन जितना खुद में उटपटांग होता है, भारी मात्रा में उसकी अभिव्यक्ति वाली कविता कला की दृष्टि से कुछ गड़बड़ करती है। इस गड़बड़ के कारण कई अच्छे कवियों को कलापारखी आलोचक मान्यता नहीं देते, या कम मान्यता देते हैं। इसके कारण उन्हें रिकगिनेशन में दिक्कत आती है। इस दिक्कत के कारण या इसके दबाव से कला-पक्ष पर इस तरह के कवि जितना ज़्यादा ध्यान देने की कोशिश करते हैं, उससे अधिक मात्रा में उनका अवचेतन कविता में विस्तार पाता जाता है। यह बात आग्नेय में है।

कविता में, यह एक हद तक ज़रूरी है, हम अमूर्त विचारों को ढूँढ़ें, कोई दूसरी चीज़ उसमें देखें। कला की दृष्टि से गड़बड़ कविता इस बात का अधिक मौका देती है। इस दृष्टि से हमारी निगाह विनय दुबे की कविता पर जाती है।

यदि कोई प्रश्न करे- बिनय दुबे की कविता क्या करती है? मेरा उत्तर होगा- यह वही नहीं करती जो किसी सजग कवि के द्वारा भाषा से करवाने की चेष्टा की जाती है। विनय दुबे की कविता में असजगता ही उसके प्राण हैं। इस तथ्य से रूबरू होने के लिए ज़रूरत है भाषा और संवेदना के ‘विचित्र’ रिश्ते को समझने की। कल्पना करें कि कोई आदमी अचानक पेट पकड़कर ‘आँय-बाँय’ बोलने लगे। हम पूछें’- क्या हुआ? वह उत्तर दे- पेट दुख रहा है। लगभग यही काम विनय दुबे की भी कविता करती है। वह मनुष्य के भाव और संवेगों को भाषा से भी पहले पकड़कर उसी रूप में उसकी व्यंजना कर देती है। यानी कोई सफाई देने वाली भाषा के आने से पहले ही कविता तैयार हो जाती है। कविता की यह नैसर्गिकता एक दुर्लभ वस्तु है, जो हमारे समय में सिर्फ़ विनय दुबे में ही देखी जा सकती है।

विनय दुबे की व्यंजना-शैली वाग्मिक अधिक है: यह, ऊपर की बात से जोड़कर कहें, असजग वाग्मिक शैली है। बात पहले कह दी; कहने के बाद ही पता चलेगा कि इसमें कहा क्या गया है। एक कविता है- ‘खूबसूरत लड़की’।

खूबसूरत लड़की

शुरू से अखीर तक

कमरों से आँगन तक

आँगन से पेड़ तक

पेड़ से आकाश तक

आकाश से हम तक

हम से लोगों तक

लोगों से औरतों तक

औरतों से कमरों तक

खूबसूरत होती है

(फिलहाल यह आसपास, पृ.-14)

हम कह सकते हैं कि पेट की पीड़ा को लेकर जैसे आँय-बाँय बोल दिया जाता है, वैसे ही एक खूबसूरत लड़की के बारे में बोल दिया गया है। इस वास्तविकता के बावजूद कविता कुछ और भी कर रही होती है। उसे हम इस बात से समझ ही नहीं सकते जो कविता में कही जा रही है। कविता तो ऊपर से सिर्फ़ स्वांग-भर रही है। लेकिन स्वांग का जो वृत्त तैयार हुआ है कि- कहाँ से कहाँ तक खूबसूरत लड़की खूबसूरत होती है, उसमें कवि की इच्छा की थाह ली जानी चाहिए, फिर कविता अपने कवितापन के साथ उभरकर आ जाएगी।

विनय दुबे की कविता में नैसर्गिकता है, इसका अर्थ यह नहीं कि इसमें सीधापन या भोलापन है। जिसे ‘वितंडा’ (सोफिस्ट्री) कहते हैं, उस शैली का तर्क है विनय दुबे की कविता में- इसमें सत्य लगने वाले गलत तर्कों का जानबूझकर इस्तेमाल किया जाता है। दूसरे शब्दों में, इसमें ऐसे कूट तर्कों का इस्तेमाल होता है कि कोई छुपी हुई बात स्वयं ही अपना बखिया उधेड़ कर प्रकट हो जाए। इस तथ्य का विलक्षण उदाहरण है ‘आपने गौरैया देखी है’ कविता।

आपने गौरैया देखी है

आप किसी पेड़ के नीचे से गुज़रे हैं

तब ज़रूर

आपके सिर पर

या कंधे पर -

गौरैया ने बीट की होगी ज़रूर

और आपने सहज ही पोंछ भी ली होगी उसे

अगर आपके साथ

नहीं हुआ है

यह

तो न आपने गौरैया देखी है

और न आप किसी पेड़ के नीचे से गुज़रे हैं

(वही, पृ.-7)

कवि की इस कुटिलता के आगे ‘अभिजात’ निर्वश हो जाता है। सिर्फ़ इसमें ‘विट’ की बात नहीं है; काव्यशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो यह विरोधाभास का भी सुन्दर उदाहरण है।

दूसरी अच्छी बात यह है कि विनय दुबे की कविता सामने वाले को कुछ चिढ़ाती हुई नज़र आ सकती है, लेकिन यह पीड़ा पहुँचाने वाली कविता नहीं है। यह कुछ कचोटती-कुरेदती है तो इसके पीछे मंशा केवल इतनी होती है कि हम अपने परिवेश और दूसरों की पीड़ा से अपरिचित न रहें। इस बात के साथ ही, यह ‘अभाव’ से पैदा होने वाली भाव-विलक्षणता को प्राप्त करने में समर्थ है। जैसे यही भाव कि एक आदमी को इतनी फुर्सत तो मिलनी चाहिए, वह अपनी पत्नी को ‘रोटी सेंकते हुए/ धूप नहाते हुए/ बदन सुखाते हुए/ बाल सँवारते हुए’ देख सके। उद्धृत पंक्तियाँ विनय दुबे की बहुचर्चित कविता ‘प्राचार्य जी महोदय’ की हैं। कविता आवेदन की शैली में लिखी गई है- यह छुट्टी के लिए आवेदनपत्र का एक अंश है। इसे पढ़कर स्मरण हो आती है भर्तृहरि की यह कविता:

राजंस्तृष्णाम्बुराशेर्न हि जगति गतः कश्चिदेवावसानं

को वार्थोडर्थेः प्रभूतैः स्ववपुषि गलिते यौवने सानुरागे।

गच्छामः सद्म यावद्विकस्ति नमनेन्दीवरालो किनीना-

माक्रम्याक्रम्य रूप झटिति न जरया लुप्यते प्रेयसीनाम।।

(हे राजा! तृष्णा-रूपी इस संसार के समुद्र का अन्त नहीं है। फिर, अपनी देह में यौवन को गलाकर बहुत धन पाने का भी क्या मतलब? इसलिए खिले कमल के समान आँखों वाली हमारी प्रेयसियों का बुढ़ापा रूप हर न ले, उससे पहले हमें अपने घर जल्दी-से पहुँच जाने दो।)

विनय दुबे की कविता में तात्कालिकता के भीतर भी ‘शाश्वत’ उभर कर आता है। तात्कालिकता के दबाव के भीतर स्वयं कवि यह महसूस करने के लिए विवश है कि कविता तो अन्ततः शाश्वत की रचना है। इसलिए उसे कहना पड़ता है:

पीपल लिखेगा महान कविता

नदी लिखेगी महान कविता

पहाड़ लिखेगा महान कविता

(वही, पृ.-22)

वस्तुतः विनय दुबे के लिए कोई वस्तु अपने उपस्थित रूप में ही महान है। इससे अलग, कोई दिल्ली में है या उप प्रधानमंत्री है, वह महत्त्वपूर्ण नहीं है (देखें, ‘आग्रह’ और ‘ये जो आप हैं तो होंगे आप’ कविता)। दूसरी बात, जैसी यह दुनिया है और उसकी वस्तुएँ हैं, वैसे ही हमारे सुख-दुख हैं। इसलिए, कुछ भी हो गया हो अब तक, इसके लिए विनय दुबे का कवि दुखी नहीं है (देखें, ‘जो होना था’ कविता)। यही है विनय दुबे की मुख्य-चेतना, जिसे ‘शाश्वत-बोध’ के काव्यशास्त्र से मिलाकर देखा जाना चाहिए।

विनय दुबे की कविता में, अकाव्यात्मक कथन के भीतर भी काव्यात्मकता की सृष्टि होती है। इसे समझने के लिए ‘मंसाराम बसोड़’ कविता का उदाहरण देना चाहूँगा और एक कहानी का उल्लेख करूँगा, जिसे हमारे कॉलेज के एक शिक्षक कहते थे। कॉलेज में एक कहानी प्रतियोगिता हुई थी। कहानी का विषय था- ‘गरीब आदमी’। एक अत्यंत धनी परिवार की लड़की ने कहानी की शुरुआत इस प्रकार की- ‘रामू एक गरीब लड़का था। उसके पिता बहुत गरीब थे। उसकी माँ भी गरीब थी। उसके भाई और बहन भी गरीब थे...।’ गरीबी क्या होती है, वह लड़की नहीं जानती थी। उसने जैसे कथन रचे थे, उसी से मिलते-जुलते कथन विनय दुबे ने मंसाराम बसोड़ के लिए रचे हैं-

मंसाराम जानता है

वह बसोड़ है

उसके बाप-दादा भी बसोड़ थे...

वह मुश्किल से खा-पी पाता है

उसके बाप-दादा भी मुश्किल से खा-पी पाते थे

वह नीचा सिर किए चलता है

उसके बाप-दादों ने भी सिर नहीं उठाए थे कभी

मंसाराम बीमार है

उसके बाप-दादा भी हमेशा बीमार रहते थे

पर मंसाराम दुखी है अपनी बीमारी पर

वह जानता है

उसके बाप-दादा अपनी बीमारी पर

दुखी नहीं होते थे कभी

मंसाराम को दुख है पर

(वही, पृ.-8)

कथन एक ही प्रकार के हो सकते हैं। फ़र्क इसके बावजूद पैदा हो जा सकता है, विषय के मर्म की पहचान से। कॉलेज वाली लड़की की कहानी की भाषा में विनय दुबे ने मर्म की खोज कर ली है; इस तरह विरोधाभास के उदाहरण की एक करुणाधर्मी कविता तैयार हो गई है। एक अकाव्यत्मक कथन के भीतर काव्यात्मकता पैदा हो सकती है, बशर्ते उसे रचने वाला व्यक्ति प्रेम और करुणा से संचालित हो रहा हो।

विनय दुबे उन कवियों में से नहीं हैं जो जीवन से कविता को ऊपर या अलग मानते हैं। इसका यह भी अर्थ नहीं है कि जीवन से उनकी कविता एकमेक हो गई है। वस्तुतः उनकी कविता जीवन से रिश्ते की तलाश की कविता है। इस तलाश की मुख्य शैली है रोज़नामचा की या निबन्धात्मक टिप्पणी की। वाग्मिता के कारण इसमें समर्थ गद्य का लय पैदा हो गया है।

‘हम बुदनी फिर कभी नहीं गए’ या ‘दैनंदिन’ रोज़नामचा शैली की बढ़िया कविताएँ हैं। यह बात दूसरी कविताओं में भी है; लेकिन वाग्मिता की आत्यांतिक्तता के कारण रोज़नामचा वाली चीज़ थोड़ी दबती भी है, और टिप्पणी का स्वर हावी पड़ने लगता है। बहरहाल, ये बातें केवल विधागत प्रकृति तक महत्त्व रखती हैं। इन सबसे ऊपर विनय दुबे की कविता जीवन-राग की कविता है। इस राग का श्रोत है- पृथ्वी के जीव-जन्तुओं और वनस्पतियों से रिश्ते की भावना।

विनय दुबे अपने स्वभाव से अत्यंत वानस्पतिक हैं। नीम सबसे प्रिय पेड़ है उनका- वह लगभग कविता का पर्याय है:

एक कविता है नीम

सघन फूली-फली

महकती

महक रहा है पूरा आसपास

(वही, पृ.-42)

यहीं पर एक सख्त टिप्पणी भी कर लें। कई बार बुद्धि-विद्वेष के कारण विनय दुबे अपनी कविता को नष्ट करते रहे हैं। मसलन, इसी कविता को लें, उपर्युक्त चार पंक्तियों को लिखने के बाद कवि को क्यों यह कहने की ज़रूरत आ पड़ी?-

घूर रहा है आलोचक

हतप्रभ

फिर

हाथ बढ़ाता है

तोड़ने के लिए दातौन

(वही)

क्या वास्तव में आलोचना कोई सृजन के अज्ञान या विरोध से पैदा होती है?

वस्तुतः जिस असजगता से, जिसकी हमने शुरू में चर्चा की, विनय दुबे की कविता बनती है, उसके प्रति आग्रह अथवा दंभ के कारण ही कई जगह उनकी कविता नष्ट भी हो जाती है।

जीव-जन्तुओं में विनय दुबे के यहाँ चिड़ियाँ हैं, भैंसें हैं, मछलियाँ हैं, वगैरह। एक कविता है ‘भैंस’। इस कविता में दो अच्छी बाते हैं। एक तो यह है कि कविता में दुर्लभ बिम्बात्मक वाग्मिता है: ‘भैंस/ खूटें से बँधी/ एक काली तराशी गई चट्टान’। यह कविता अपनी पूरी बनावट में स्वाभावोक्ति का सुन्दर उदाहरण है। इसी से जुड़ी दूसरी बात है कि इस कविता में भैंस पर मनुष्य या स्वयं कवि के विचार या पूर्वग्रह का आरोप नहीं है।

प्रायः कवि कविता लिखने के साथ-साथ अपनी कविता में कविता की परिभाषा गढ़ने का भी काम करते हैं। यह काम विनय दुबे ने भी किया है और अपनी कविता के स्वभाव के अनुरूप तो किया ही है, उसमें बड़े संदेश की गुंजाइश भी छोड़ी है। एक कविता है ‘जहाँ कुछ नहीं हो रहा है’-

वहाँ राजनीति हो रही है

यहाँ भूख हो रही है

वहाँ भीड़ हो रही है

यहाँ सन्नाटा हो रहा है

वहाँ जगमग हो रही है

यहाँ अंधकार हो रहा है

जहाँ कुछ नहीं हो रहा है

वहाँ कविता हो रही है

(वही, पृ.-36)

इसमें आगे अपने आप जुड़ जाता है- सभी खाली जगहों पर कविता का कब्जा होना चाहिए। हमारी यह कोशिश दूसरी विसंगतियों को कम करने या खत्म करने में काम आएगी। महत्त्वपूर्ण बात यही है, और यह विनय दुबे की कविता में है।

आग्नेय की कविता के सन्दर्भ में पीछे हमने अनुपस्थित अर्थ की धारणा रखते हुए उनकी ‘आत्महत्या का पक्ष’ कविता की व्याख्या की है। इस दृष्टि से यहाँ हम विनय दुबे की ‘मैं जहाँ रहता हूँ’ कविता का अर्थ लगाना चाहते हैं। कविता में कुल पाँच स्टैंजा हैं। एक साथ हम तीन स्टैंजा उद्धृत कर रहे हैं:

मैं जहाँ हूँ और जहाँ रहता हूँ

भुतही गूँजों का घटाटोप है वहाँ

और एक बीहड़ है भाँय-भाँय जंगलों का

एक सघन है अँधेरों के तिलिस्म का

मैं जहाँ हूँ मेरे आसपास धरती पर

नहीं देखा मैंने नदियों का गंभीर

आकाश का विस्तृत और पहाड़ का ऊँचा

कितने-कितने डोलड्रमों के बीच

हिंस्रकों से घिरा हुआ हूँ मैं

घिरा हुआ हूँ मैं मंत्रियों के जलसों में

हाँ जी हुजूरों में अफ़सरों के हुकुमों में

और बाई-साहिबों के बुलावों में

(भीड़ के भवसागर में, पृ.-39)

बात कुछ ‘आत्महत्या का पक्ष’ कविता जैसी है। भयावह दुनिया, टुच्चे और हिंसक लोग, लुटेरी महत्त्वाकांक्षा से ग्रस्त चाटुकार- आदि। ‘एक सघन है अँधेरों का तिलिस्म का’ जिसे पार करके नदियों का गंभीर, आकाश का विस्तृत पहाड़ का ऊँचा देखना मुश्किल है। घोर उदासी और विषाद के लिए इससे बड़ा कारण और क्या हो सकता है! उदासी या विषाद के लिए अंगरेज़ी का ‘डोलड्रम्स’ शब्द आया है- ‘कितने-कितने डोलड्रमों के बीच’! ‘डोलड्रम्स’ शब्द के प्रयोग ने उदासी में से उदासी को घटा दिया है, विषाद को हल्का कर दिया है। विजातीय भाषा के प्रयोग से यह बात पैदा हो गई है, और अनायास पैदा हो गई है। कवि का स्वभाव ही नहीं कि वह उदासी और विषाद में जिए। यह बात विनय दुबे को आग्नेय से अलग करती है। आग्नेय जिसे घोर पीड़ा के रूप में लेते हैं, विनय दुबे उसे झटक देते हैं, उसके प्रति उनकी मुद्रा व्यंग्यात्मक होती है। अलगा स्टैंजा है:

मैं जहाँ हूँ और जहाँ रहता हूँ

रहता हूँ मैं कई-कई रोगों में

कई-कई भूखों में मजबूरियों में

रहता हूँ मैं कितनी घृणाओं में

कितने दुव्र्यवहारों और अभावों में

कितने असहायों और कितने निरुपायों में

भूखा हूँ प्यासा हूँ नंगा-अधनंगा हूँ

आदिम हूँ अनुसूचित हूँ प्रदर्शनी-हाट में।

(वही)

यानी जो है, सब स्वीकार है। उसके कारण आत्महत्या के पक्ष में तर्क तैयार करने की ज़रूरत नहीं है।

इसमें भाषा की बहुत भड़भड़ है, बहुत बकबक है। उसी में से सबसे ज़्यादा उभर कर आती है ‘हूँ’ क्रिया। और इस ‘हूँ’ के भीतर जो ‘होने’ नाम का भाव है, उस स्पेस में साइलेंस का निवास है। यह साइलेंस ही है जहाँ ‘कवि रहता है’। अंतिम स्टैंजा दो पंक्तियों का है:

मोगरे चमेली के फूलों और खुशबुओं से दूर

मैं जहाँ हूँ और जहाँ रहता हूँ

(वही)

अभाव, अभाव- हर स्टैंजा में अभाव का भाव है। मगर कविता जिस बात पर खत्म होती है ‘मोगरे चमेली के फूलों से दूर/ मैं जहाँ हूँ/ और जहाँ रहता हूँ’, इसमें जो ‘दूर’ है, उसी ने उन सभी जगहों को घेर लिया है जिसमें वंचित रूप से कवि रहता है। इस तरह वंचितों के लोक को सुवासित स्वायत्तता प्राप्त हो गई है।

यह है ‘मैं जहाँ रहता हूँ’। इसे पढ़ते हुए भी निराला की कई पंक्तियाँ याद की जा सकती हैं –

बाहर मैं कर दिया गया हूँ। भीतर पर भर दिया गया हूँ।

या

मरण को जिसने वरा है

उसी ने जीवन भरा है।

आदि।

यह निराला की पंक्तियों से जोड़कर विनय दुबे को महानता प्रदान करने वाली बात नहीं है। इसमें एक दूसरी बात भी है। विनय दुबे की कविता में अनुपस्थित अर्थ निहित स्वार्थ भी है, अंगरेज़ी में जिसे ‘वेस्टिड इंटरेस्ट’ कहते हैं। जो लोग दुबे जी को व्यक्तिगत रूप से जानते रहे हैं, उन्हें पता होगा कि यह बात उनके स्वभाव में ही रही है। यह कविता में भी आती है। यानी उन्हें वह भी चाहिए जिसके प्रति उनमें वितृष्णा का भाव है। यह बात कई कविताओं में है। एक कविता है- ‘दिल्ली होने से तो अच्छा है’:

दिल्ली की तरफ तो मैं भूलकर भी नहीं देखता हूँ

दिल्ली होने से तो अच्छा है

अपनी रूखी-सूखी खाकर यहीं भोपाल में पड़ा रहूँ।

(वही, पृ.-18)

यह झूठी बात है। असली अर्थ इसका है कि विनय दुबे को दिल्ली मिली ही नहीं। वरना उन्हें दिल्ली चाहिए थी। ऐसे कई स्वार्थ उनके भीतर पलते थे। कविता में भी वे हैं। और इसे कविता की खूबी के रूप में ही देखना चाहिए और सवाल यह है कि दिल्ली क्यों नहीं चाहिए विनय दुबे को? दिल्ली अमीरों और गिरोहबाजों को ही चाहिए, और विनय दुबे को मंसाराम बसोड़ की भुखमरी और बीमारी!

कविता की रचना, जैसा कि हमने शुरू में कहा, प्रतीकों के तर्क, बिम्ब सुघड़ता आदि से अधिक समस्यापूर्ण है। बड़े कवियों की सुरचना में यह बात दब जाती है। कला की दृष्टि से गड़बड़ कविता इस दृष्टि से विचार का बेहतर मौका देती है।

संदर्भ

(1) वाल्टर बेंजामिन, इल्युमिनेशंस, पृ.-239.

(2) मॉरिस ब्लैंचोट, दी राइटिंग ऑफ़ डिजास्टर, पृ.-41.

(3) राजकमल चैधरी, बर्फ़ और सफेद कब्र पर एक फूल, पृ.-117.

(4) मॉरिस ब्लैंचोट, दी राइटिंग ऑफ़ डिजास्टर, पृ.-36.

(5) आग्नेय की एक कविता का शीर्षक, पहचान/4, पृ.-2.

सुधीर रंजन सिंह - कवि, आलोचक। काव्य संकलन ‘और कुछ नहीं तो’, ‘मोक्षधरा’; काव्य-अनुरचना भर्तृहरि : कविता का पारस पत्थर’; और आलोचना की पुस्तक ‘हिन्दी समुदाय और राष्ट्रवाद’, ‘कविता के प्रस्थान’ प्रकाशित। भोपाल के शासकीय महाविद्यालय में प्राध्यापन।

ईमेल - singhranjansudhir@gmail.com