(लेख) पाकिस्तान में जाति: चुप्पी के षडयंत्र का शिकार एक सवाल - शाहबानो अलियानी

ठारपारकर में एक दूरस्थ ग्रामीण गांव से एक गर्भवती महिला हैदराबाद में एक निजी अस्पताल जाती है। वहां के चिकित्साकर्मी उसे चिकित्सा प्रदान करने से यह कहकर मना कर देते हैं कि उनके हाथ और उपकरण प्रदूषित हो जायेंगे। अपमानित और नाराज अवस्था में वह बिना चिकित्सा प्राप्त किये अपने गाँव लौट आती है। पेशावर की 20 वर्षीया महिला की उसके भाई और पिता द्वारा बिरादरी से बाहर शादी करने की कोशिश में बेरहमी से हत्या कर दी जाती है। कपास के खेतों में काम करने वाली एक युवा कोलही लड़की का मीरपुरखास के बाहर अपहरण कर लिया जाता है। उसे जबरन इस्लाम कबूल करवा कर अपहरणकर्ता से शादी करवाई जाती है। पुलिस उसके परिवार को सुरक्षा की खातिर चुप रहने की सलाह देती है और केस दर्ज नहीं करती है। दक्षिणी पंजाब में एक गाँव में एक निचली जाति के युवक पर उच्च जाति की महिला से प्रेम कर उक्त जाति के सम्मान को ठेस पहुँचाने के आरोप में पंचायत उसकी बहन के साथ उक्त जाति के पुरुषों द्वारा ‘सामूहिक-बलात्कार’ करने की सजा सुनाती है ताकि उक्त जाति की इज्जत पुनर्बहाल हो। पाकिस्तान में यह कई रूपों में नियमितता से घटित होता है जिनमें कुछ तो मीडिया की नजरों से गुजरता है, बाकी पीड़ितों के भय, बेबसी और समाज की उदासीनता में दफन हो जाता है।

इन कहानियों में आम क्या है? पीड़ितों में सभी महिलायें हैं। यहाँ एक और समानता है। ‘इस्लामी गणतंत्र पाकिस्तान’ में, दलित हिंदू और मुस्लिम महिलायें दोनों जाति और लिंग की वजह से हिंसा, अपमान और दासता की शिकार हैं ।

सामान्य तौर पर विकास कार्यकर्ताओं और नीति निर्माताओं के लिए जाति सामाजिक न्याय और सामाजिक नीति के लिए मायने नहीं रखता है, विशेष रूप से देश के मुसलमानों के लिए । लेकिन पाकिस्तान में लगभग सभी आसानी से स्वीकार करेंगे कि जाति-बिरादरी-कौम विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। ज्यादातर वयस्कों से उनकी जाति या zaat के बारे में नयी जगह में सवाल पूछे गए होंगे। अधिकांश ने शादी अपनी ही जाति में की होगी, कभी भी बिरादरी से बाहर शादी करने को विकल्प के रूप में देखा भी नहीं होगा। लगभग सभी ने छोटी-नीच जातियों के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया होगा। हारिस गजदर के अनुसार “ देश में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संपर्क की प्रधान कुंजी कौम, जात और बिरादरी ही बनी हुई है।" ‘क्या जाति समस्या है?’ पूछने पर अधिकांश पाकिस्तानी असहमति जताएंगे, कई उग्र बहस में पड़ जायेंगे और इसे सिर्फ सीमा-पार हिन्दुओं की समस्या बतायेंगे। वे जोर देकर जाति-व्यवस्था को गैर इस्लामी बतायेंगे और चूंकि पाकिस्तान इस्लामी देश है, वहां जाति समस्या से इंकार करेंगे। उत्तर भारत के मुसलमानों में जाति व्यवस्था तीन स्तरों पर पायी जाती है : अशराफ, अजलाफ और अरजाल।

सार्वजनिक इंकार इतना व्यापक और गहरा है कि कोई आधिकारिक विधान जाति-समस्या को मानने और उसके निदान हेतु उपलब्ध नहीं है। 1947 में ब्रिटिश भारत के विभाजन के बाद पाकिस्तान को विरासत में अनुसूचित जाति और जनजाति की सूची मिली। पाकिस्तान के संविधान (1935 संविधान की तरह) में जाति के आधार पर भेदभाव की मनाही है । अनुसूचित जातियों को 1948 से 1998 तक सरकारी नौकरियों में 6 % आरक्षण प्राप्त था जिसका कभी पूरा उपयोग नहीं हो सका । हमारे यहाँ इन मुद्दों पर भारत की तरह प्रगतिशील कानून नहीं है (हालांकि वहां अन्य मुद्दे भी हैं)। कुछ लेखों और अध्ययनों के अलावा, दलित हिन्दू समेत, निम्न जातियों से सम्बंधित दस्तावेज और आंकड़े पाकिस्तान में उपलब्ध नहीं है।

मेरे अपने काम में कार्यकर्ताओं और शोधकर्ताओं का तर्क रहा है कि विकास (गरीबी-उन्मूलन) या सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर अनुसंधान के लिए जाति प्रासंगिक नहीं है । 40%-50% हिंदू (अधिकांश दलित) आबादी वाले जिलों में काम कर रहे सहयोगी जोर देकर सर्वेक्षण प्रश्नावली में जाति को शामिल करने से मना करते हैं । उनका तर्क है कि (1) इतनी सारी जातियों से संबंधित आंकड़ों को संभालना मुश्किल हो जाएगा (2) उन पर जातिविशेष के पक्ष में काम करने का आरोप लगाया जाएगा। यह प्रतिरोध हिंदू और मुस्लिम दोनों सहकर्मियों की ओर से आता है किन्तु मुस्लिमों सहयोगियों द्वारा ज्यादा। प्रश्नावली तैयार करने के दौरान प्रतिरोध के बावजूद जाति को शामिल कर लेने पर भी अंतिम निष्कर्षों से इसे सर्वेक्षण के प्रबंधकों द्वारा हटा दिया जाता है।

ऐसा प्रतीत होता है, जाति कमरे में मौजूद विशालकाय हाथी की तरह है जिसकी मौजूदगी का हर किसी को एहसास है किन्तु कोई उसके विषय में बात करने के लिए तैयार नहीं है। हारिस गजदर के अनुसार, "सार्वजनिक मामलों में जाति के सवाल पर चुप्पी और निजी लेन-देन और सौदेबाज़ियों में जाति की व्यापकता समाज के अन्दर व्याप्त विरोधाभास को इंगित करता है।"

पाकिस्तान में जाति व्यवस्था भारत की तर्ज पर विकसित हुई है। सैयद (सिंध में शाह) पैगंबर मुहम्मद (सा अ व) के वंशज होने का दावा करते हैं और लगभग पूरे पाकिस्तान में उच्चतम जाति है। पंजाब में राणा (राजपूत), चौधरी और मलिक उच्च जाति माने जाते हैं, जबकि कम्मी (श्रमिक), चूहड़ (अछूत सफाईकर्मी जो ज्यादातर ईसाई हैं), मुस्सली (मुस्लिम शेख - सेवक श्रमिकों) और मिरासी (संगीतकारों) निम्न जातियों में शुमार है। पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत में निम्न जातियों को नीच जात और बद्नसल (बद+नसल यानि खराब नसल) कहा जाता है। बलूचिस्तान में निचली जातियों में गुलाम(दास),लोहरी(संगीतकार) और लच्छी (दलित) शामिल हैं। सिंध में,उच्च जातियों के मुसलमानों में शाह और सैय्यद के अलावा कुछ और जातियां शामिल हैं। हज्जाम,धोबी, कुम्हार,मल्लाह और भजीर (इस्लाम में धर्मान्तरित दलित) निम्न जाति के माने जाते हैं। स्वात जैसे स्थानों में कौम प्रणाली हिंदू जाति व्यवस्था के समतुल्य है। यहाँ समूह व्यवसाय के अनुसार सख्ती से विभाजित हैं। कौम आपस में रोटी-बेटी का संबंध नहीं बना सकते। जाति पाकिस्तानी मुसलमानों के लिए एक महत्वपूर्ण सामाजिक पहचान है, जिसका सबूत मंगनी/विवाह से संबंधित सेवाओं के विज्ञापन में मिलता है। जाति आधारित शादियों को प्रवासी पाकिस्तानियों, विशेष रूप से ब्रिटेन में, प्राथमिकता मिलती है।

भारत और नेपाल की तरह पाकिस्तान में निम्न जातियों के हिंदुओं और मुसलमानों को उच्च जातियों विशेषकर इनके पुरुषों द्वारा बहिष्कृत किया और सताया जाता है। फरवरी, 2009 में नस्लीय भेदभाव के उन्मूलन पर संयुक्त राष्ट्र समिति को प्रस्तुत संयुक्त एनजीओ की रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान उन चुनिन्दा मुल्कों में है, जहां गुलामी प्रथा अभी भी बंधुआ मजदूरी के रूप में मौजूद है । पाकिस्तान में सबसे अधिक बंधुआ मजदूर दलित और निम्न जातियों के मुस्लिम और ईसाई परिवारों के व्यस्क और बच्चे होते हैं।

आंकड़ों के माध्यम से ‘जाति समस्या’ से इंकार किया जाता है। सबसे हालिया 1998 की जनगणना के अनुसार दलित हिंदुओं की संख्या मात्र तीन लाख के करीब है, बीस लाख पाकिस्तानी हिंदुओं के बीच एक अल्पसंख्यक। जबकि दलित नेताओं और कार्यकर्ताओं, जिनमें 5 पूर्व विधायक शामिल हैं, के अनुसार यह आंकड़ा बीस लाख के करीब हो सकता है। उनका कहना है कि सवर्ण हिन्दू और पाकिस्तानी सरकार वास्तविक संख्या की पहचान नहीं करना चाहते हैं ताकि दलितों के मुद्दों को संबोधित करने और उनके खिलाफ भेदभाव दूर करने हेतु कोई वैधानिक कार्यक्रम चलाने से बचा जा सके।

अधिकांश दलित सामाजिक रूप से बहिष्कृत हैं, शहरों और गांवों के बाहरी इलाके में रहने को मजबूर या अपने स्वयं के पारा या गांवों तक ही सीमित । सरकार और यहां तक कि उनके इलाकों में कार्यरत गैर सरकारी संगठन भी थारपारकर के भील और कोहली पारा को नजरंदाज कर देते हैं। गरीबी और परिसंपत्तियों की कमी के कारण, वे खेत और सफाई का काम लेने के लिए मजबूर और शादी जैसे समुदायिक त्योहारों में भाग लेने से वंचित हैं। अगर वे आमंत्रित भी हैं तो अलग बर्तन में बाहर खाना खाने के लिए बाध्य हैं। वे सामाजिक सेवाओं से वंचित किये जाने के अलावे सार्वजनिक स्थलों यथा अस्पतालों,सार्वजनिक बसों और स्कूलों में भेदभाव के शिकार होते हैं। जिस जमीन पर वे सदियों से बसे रह चुके हैं वो ज्यादातर राज्य की संपत्ति है और उस पर उनका कोई कानूनी दावा नहीं है।

निस्संदेह, उनके बच्चों के अलावा, दलित महिलायें देश के सबसे गरीब, कमजोर और वंचित समूह में से एक हैं। वे राजनीतिक और सामाजिक मुख्यधारा से बहिष्कृत होने के साथ लिंग और जाति के कारण हिंसा और भेद-भाव की शिकार हैं।

एक थारी सहयोगी के अनुसार, कोहली महिलायें उच्च जाति के हिंदू और मुसलमान पुरुषों द्वारा खेतों में काम करते हुए या रेगिस्तान में पशुओं को चराने के दौरान अक्सर बलात्कार की शिकार होती हैं। समाज के बड़े हिस्से द्वारा कोहली महिलाओं को कमतर इंसान समझा जाता है, अतः उनके खिलाफ शारीरिक या यौन हिंसा कोई उल्लेखनीय बात नहीं। यह समाज का तथ्य भर है। 750 दलित परिवारों के अध्ययन से पता चलता है कि कई दलित महिलाओं का मुस्लिम पुरुषों द्वारा बलात्कार या सामूहिक-बलात्कार हो चुका है। अधिकांश मामलों को पुलिस और अपराधियों की जाति से प्रतिशोध के डर से दर्ज नहीं करवाया गया।

हारिस गजदर की ईसाई, मुस्लिम और हिन्दू निम्न जातियों की महिलाओं के खिलाफ देश भर में हिंसा पर रिपोर्ट :

हम लोगों ने देश भर - पेशावर,फैसलाबाद,क्वेटा और संघर में – में निम्न जातियों जैसे चुहरा, मुसली,लच्छी और हिन्दू दलित जातियों की महिलाओं पर किये गए बलात्कार के मामलों का दस्तावेजीकरण किया। सभी अपराधी अच्छी तरह से जाने जाते थे और ऐसा प्रतीत हुआ कि उन्हें अपराध कर बच निकलने का पूरा भरोसा था क्योंकि वे पीड़ित महिलाओं के कमजोर सामाजिक-राजनीतिक पृष्ठभूमि से वाकिफ थे। बलात्कार की ये घटनाएं हाशिए के सामाजिक समूहों द्वारा झेले जा रहे यौन हिंसा के सबसे चरम उदाहरण थे। वर्चस्ववादी सामाजिक समूहों की भाषा में चूंकि निम्न जातियों को कोई सम्मान नहीं होता है, उनके सम्मान की रक्षा का सवाल ही नहीं उठता। पेशावर के खान, जो खुद को अफगानिस्तान से 11 वीं सदी के पश्तून आक्रमणकारी जनजातियों के नस्लीय रूप से शुद्ध वंशज मानते हैं, “हमसाया” (शाब्दिक अर्थ में ‘पड़ोसी’ किन्तु लोक अर्थ में सेवक जातियां) की महिलाओं को नैतिक और चारित्रिक रूप से कमजोर समझते हैं जिनके यौन शोषण का हमसाया जाति के पुरुष खुला विरोध नहीं कर सकते ।

मुख्तारन माई न्याय के लिए किये गए अपने साहसी सार्वजनिक अभियान के लिए मशहूर हैं। माई को सजा के रूप में पुरुष-समुदाय द्वारा अधिकृत क्रूर सामूहिक बलात्कार का सामना करना पड़ा, क्योंकि उसके जवान भाई पर उच्च जाति की एक महिला से बात करने का आरोप था। इस तथ्य का विश्लेषण कभी भी नहीं हुआ कि माई और उसके भाई बलात्कार के अपराधियों से निम्न जाति के हैं।

जाति आधारित पितृसत्तात्मक हिंसा का एक और मामला मुल्तान की एक निम्न जाति से आने वाली उच्च शिक्षित मुस्लिम औरत गजाला शाहीन का है। गजाला का उनकी माँ के साथ अपहरण कर सामूहिक बलात्कार किया गया। गजाला शाहीन के चाचा उच्च जाति के बलात्कारियों के परिवार की एक औरत के साथ कथित तौर पर फरार हो गए थे। चाचा के अपराध की सजा गजाला को इसलिए दी गयी कि वह उसके परिवार की एक औरत थी और एक ऐसी औरत थी जिसने निम्न जाति में जन्म लेकर भी उच्च शिक्षा प्राप्त करने का साहस किया था।

इन महिलाओं के अपहरण, जबरन धर्म-परिवर्तन, सामूहिक बलात्कार, हत्या, सडकों पर निर्वस्त्र घुमाए जाने की घटनाओं के तह में जाति मौजूद है। कुछ निडर शोधकर्ताओं और मुट्ठी भर दलित कार्यकर्ताओं को छोड़कर, पाकिस्तान में अन्य सभी इस मुद्दे पर चुप है।

बढ़ी हुई सैन्यीकरण और ध्रुवीकरण के समय में, क्या हम इस तरह के व्यापक और विभाजनकारी मुद्दे की अनदेखी का खतरा उठा सकते हैं जिनसे महिलाओं पर हिंसा, शोषण और भेद-भाव का खतरा बढ़ता है ? जाति महिलाओं से संबंधित मुद्दा है और पाकिस्तान में दक्षिण एशिया की नारीवादियों के लिए इस विषय पर बोलने का वक़्त आ गया है ।

(सबाल्टर्न से साभार )

लेखिका थारदीप ग्रामीण विकास कार्यक्रम के साथ काम करती हैं और कराची,पाकिस्तान में रहती हैं।