ब्रिजेश देशपांडे ‘वारिस’की कविताएँ

नल

मेरे बस्ती में एक नल है,
पानी से पुराना नाता है उसका,
पर मानते सब उसे ‘नल’ हैं,

नलों की भी एक ज़िन्दगी है...!
मैंने देखा है उसे,
झुंझलाते हुए, खिलखिलाते हुए.
तिडतिडाते हुए, झिलमिलाते हुए,

वैसे चुपचाप उगलने वालों की कौन सुनता है,
पर जो एक बार ख़ास दे ये अगर,
घबरा के फिर आदमी कहीं और नहीं देखता है,

नलों के भी अपने-अपने ‘स्टेटस’ है,
‘पब्लिक टॉयलेट’ से राष्ट्रपति भवन तक,
हर जगह लगे ये ‘एपरेटस’ हैं,

किसी के पीतल की चमड़ी है,
किसी पे ‘निकल’ का वर्क चढ़ा है,
किसी ने ‘प्लास्टिकी’ पैरहन ओढ़ी है,
किसी में ‘एल ई डी’ का हीरा जढ़ा है.
तरतीब जो भी हो, पानी लेने को मगर,
जानिब इनके हर हाथ बढ़ा है,

गरीब नलों पर जमावड़े होते हैं,
अमीर नल अक्सर अकेले होते हैं,
गरीबों के रात-ओ-दिन में शोर-ओ-गुल है,
अमीरों के यहाँ दिन में भी रोशनी गुल है,

अमीर नलों की ज़िन्दगी में,
सिवा हवस के, कोई लुत्फ़ नहीं,
तभी नलों ने नलों में,
इन्हें निचला माना है...
ये चाहे सारी कायनात की चमक ले आयें,
मगर नलों नें इन्हें अपना नहीं माना है,

सबसे ऊँचा ओहदा मिलता है,
उसी नुक्कड़ पे लगे नल को,
जहाँ रोज़ तडके, लम्बी कतारों में,
‘भांडे’ आपस में बतियाते हैं,
झगड़ते है, समझाते है,
मनते है, रूठ जाते हैं,
ऐसे नल को ‘नलिस्तान’ में,
‘फर्स्ट सिटीजन’ मानते हैं,

पानी से कहीं ज्यादा इसने वक़्त उगला है,
ये ‘नलिस्तां’ का सबसे सयाना बगुला है,
पीढ़ियों को आते-जाते देखा है,
सीढियों पर प्यार मंडराते देखा है,
तपिश में राहगीरों को ठंडा वक़्त पिलाया है,
कई बार इसने राह-गिरों को राह पे लाया है,

इर्द-गिर्द इसके, सारी तवारीख बनती रही,
वक़्त मनमानी करता रहा, टिप-टिप की धुन बजती रही,

इसने देखें है बँटवारे, आतंक से भरे ‘कर्फ्यू’,
चिल्लमचिल्ली के नारे, झूठे ‘आश्वासन’ सारे,
जिनके लिए इसने, प्यासे दिन गुज़ारे,

सुबह के सारे टंटे, दिन की ‘मोह्तर्मी-गुफ्तगु’,
शाम के उलझे कदम, रात की ढलती आबरू,
....इसने सब देखा है!

एक दफा खाँसकर जगाई थी, इसी ने सारी बस्ती,
कई दिनों की प्यास थी, रात के तीसरे पहर बूझाई थी,

यही था जिम्मेदार कुछ रिश्तों का,
हाँ! कुछ रिश्ते इसी के सामने टूटे भी थे,

शरण में आ बैठा था मैं इसकी, जब,
माँ ने मार के चिमटा, निकाला था घर से,
हम खूब रोये थे,

बहुत खेल देखें है इसने, वक़्त के, इंसानों के,
जज्बातों के, अरमानों के,
मगर, आज गली में गहमागहमी है, वही ‘मर्सी किल्लिंग’ का दिन है,
खून चूसकर इस बुज़ुर्ग का, एक ‘पम्प’ लायेंगे, वही दिन हैं,
मेरे तो पाँव ठिठुरते हैं, चलने को भी हिम्मत नहीं होती,
यहीं जमे खड़ा, सोचता हूँ,

ता-उम्र जिस तकदीर से वक़्त पीते आये थे,
अब कौन बुज़ुर्ग, वक़्त पिलाएगा हमें...?
--

एक मासूम सी अट्ठन्नी…

एक मासूम सी अट्ठन्नी मेरे जेब में,
बदमाश से रुपये से लग के गले खनकती है,

इनके होने के एहसास से, मेरी जेब अब दमकती,
इसकी अल्ल्हड़ सी आहटों से, मेरी जेब कुछ मचलती है,
ये मासूम क्या जाने दर्द खर्च होने का,
कितना है साथ इसका, कब ये हाथों से फिसलती है,

हरपल इसकी मासूमियत ने मुझे जीना सिखाया है,
अपनी राह को मुक्कम्मल कर आगे बढ़ना सिखाया है,
अब ये मेरी जेब में हो, या सेठ की तिजोरी में,
इसने मेरी ज़िन्दगी को दोराहे से आगे बढाया है,

मगर ये मासूम सी अट्ठन्नी जो है अब मेरे जेब में,
फिर बदमाश से रुपये के गले लग के खनकती है!
--

रात ख़ामोश सी…

रात ख़ामोश सी मेरे सिरहाने ही सो गयी,
बात मदहोशी की अपने ठिकाने को हो गयी,
कोई आहट न जुम्बिश, न खबर हुई मुझको,
आँख खुली और मुनादी सेहर-आने की हो गयी।

टिमटिमाते हुए अरमान मेरे इर्द-गिर्द बिखरे थे,
टूटे काँच के निशाँ सारे कमरे में बिखरे थे,
मेरे वादों को दिल ही में महफूज़ पाया मैंने,
और तेरे वादे दूर उस आसमान पे बिखरे थे।

भरे दिन मुझे आहटें सुनाई देतीं रहीं,
किसीके ग़म किसीकी चाहतें सुनाई देतीं रहीं,
मैं बेहिस अपने-आप में उलझा रहा, मगर,
बारहा मुझे ‘अज़ानें’ सुनाई देतीं रहीं।

सूरज भी चल पड़ा अब किसी और दुनिया के लिए,
शाम ढल रही थी इधर अपनी दुनिया के लिए,
वक़्त के पहलु से लम्हें टूटते जाते थे,
कुछ मेरे आँगन में गिरे कुछ दुनिया के लिए,

अब जो रात आई है, जाने कैसी सौगात लाएगी,
मुझे मुझसे लढाएगी और फिर चली जायेगी,
मैं फिर उसे अपनी गोद में पनाह देता हूँ,
यही सोचकर के मुझे अपनी गोद में रख ये सो जायेगी।

रात ख़ामोश सी फिर मेरे सिरहाने ही सो गयी....!
--

ब्रिजेश देशपांडे ‘वारिस’ का जन्म स्थान ग्वालियर है, और इनकी परवरिश भोपाल में हुई. ‘मैकेनिकल इंजीनियरिंग’ में स्नातकोत्तर तक पढ़ाई. बैंगलोर में बतौर ‘सर्विस लेवल मेनेजर’ एक आईटी कंपनी में कार्यरत. कविता पिता ‘स्व. श्री जयंत देशपांडे ‘जय’’ से विरासत में मिली. इसी वजह से तक्खलुस ‘वारिस’ बना.

ईमेल – deshpande.brijesh@gmail.com