(कहानी) लत - नीरज पाण्डेय

हमारा नाम मोहम्मद मोजिद खान है. उमर इस साल अगस्त में सैतालिस हो जाएगी. धंधे से दर्जी हैं. यही एक काम हमको आता है और अब तक यही काम करते हुए ज़िन्दगी कट रही है. जब हमारी उमर कोई पचीस छब्बीस साल की थी तब भी हम इसी दानापुर में ही एक टेलरिंग दुकान में काम किया करते थे. घर से दुकान पहुँचने में पैदल आधा घंटा लगता था. हम घर से सुर्ती रगड़ते निकलते और रास्ता भर रगड़ते. जब दुकान पहुँचते तो मूंह में डाल लिया करते. अब सुर्ती ऐसी चीज़ है ना कि उसको जितना रगडा जाए उतना मज़ा देती है और सुर्ती का नशा वैसे भी कोई नशा नहीं है. ये तो बस एक मनोरंजन है.

तो एक रोज़ ऐसे ही हम अपनी धुन में मस्त सुर्ती रगड़ते दुकान की तरफ चले जा रहे थे. एकाएक एक ठो मारुती गाडी आकर हमारे बगल में रुकी. गाडी के अन्दर कोई बीस साल का लौन्डा बैठा था. उसको देख कर हम भी रुक गए. हमको लगा शायद कोई पता वाता पूछे. पर वो गाडी से निकला और सामने आकर के खड़ा हो गया, बोला “थोडा सुरती हमको भी दो ना यार.” हमको बड़ा वैसा सा लगा कि ये आदमी जिसका कपडा लत्ता एकदम टीपटॉप है, मारुती में चलने वाला... भाई ये हमसे सुर्ती क्यों मांग रहा है. पर हमने उस दिन उसको कुछ कहा नहीं. अपने सुर्ती में से ही एक हिस्सा निकल के उसको दे दिया. वो उसको होठ के नीचे दबाया और निकल लिया. अब उस दिन के बाद तो वो रोज हमको उसी टाइम उसी जगह पर मिलने लगा. रोज मिलता, सुर्ती लेता, कुछ कुछ बात बनाता और चला जाता. कभी कभी हमको दस बीस रूपया देने की भी कोशिश करता, पर हमने हर बार उसको मना कर दिया. उसका पैसा कभी लिया नहीं. हाँ हम हर बार यह ज़रूर सोचते कि भाई ये जितना पैसा हमको दे रहा है, उतना में कितना सुर्ती खरीद ले, लेकिन ये हमसे मांग के क्यों खाता है. पर धीरे धीरे हमको पता चल गया कि किसी किसी का ऐसे मांग कर खाने का ही आदत होता है.

एक दिन जब वो हमको फिर से कुछ रुपया देने लगा, हम फिर से उसको मना कर दिए. तो कहने लगा “ ठीक है पैसा नहीं लोगे तो चलो तुमको जहाँ जाना है वहाँ तक छोड़ दें.” हम मारुती की तरफ देखे. इससे पहले हम कभी मारुती गाडी अन्दर से नहीं देखे थे. तो उसको मना नहीं किए और यही हमसे एक बड़ी गलती हुई. साला वो हमारा दुकान देख लिया. अब रोज़ कभी दुपहरिया तो कभी शाम को आ जाए, और लगे गप्प हाँकने. पर पैसा के मामला में वो आदमी दिलदार था, जब भी आए जवान कुछ ना कुछ खर्च करे. धीरे धीरे उसका और हमारा जमने लगा. वो भी अपने परिवार के बारे में हमको बताया हम भी अपना बीवी बच्चा के बारे में उससे बात करते. तब कुछ साल पहले ही हम बाप बने थे, इक्कीस साल की उमर में. वो दानापुर से ही ग्रेजुएशन किया था. उसके बाबू जी वहीँ कैंट में काम करते थे. खूब पैसा वाला था और यह दिखता भी था. हम उससे एक दिन पूछे कि “भाई बाबूजी का तो ठीक है. पर तुम को क्या करना है जिंदगी में?” ये सुन के वो हमको ध्यान से देखा और एकदम गंभीर हो के बोला “हमको… हमको जिंदगी में मजा लेना है.” और बोल के हँस पड़ा.

हम दोनों का दोस्ती कुछ महीना का हो गया था. अब हम उसके लिए अलग से सुर्ती रगड़ कर उसको देने लगे थे. एक दिन वो हमसे कहने लगा कि “मोजिद भाई, तुमसे हमारा मन लगता है, तुम बाकी लौन्डों की तरह बकचोदी नहीं काटते. एक काम करो हमारे बंगले में आ के रहो. हमारे यहाँ कई सारा कमरा ऐसे ही खाली पड़ा हुआ है.” हमने उसकी बात पर सोचा. उस वक़्त हम किराये के मकान में रहते थे. तो हमें उसकी बात भी ठीक लगी कि भाई वहाँ रहेंगे तो दो पैसा का बचत ही होगा. तो हम उसी हफ्ता में उसके बंगले के एक कमरे में शिफ्ट हो गए. अब उसका और हमारा टाइम ज्यादा साथ में बीतने लगा. रोज़ शाम को अब जब हम अपना दर्जी का काम कर के आते तो उठाना बैठना उसी के साथ होता. रात में खाना खा के हम अपना सुर्ती रगड़ते और वो पीता ‘शराब अंग्रेजी’. एक दिन हमको पीने के लिए [पूछा भी. पहले तो हम उसको मना किए लेकिन ये कह के वो हमको थोडा सा एक गिलास में ढार के दिया कि “आज हमको तुम्हारे सुर्ती का एहसान चुकाने दो भाई.” हम उस दिन पहला बार शराब पिए. ये शराब उसके बाबू जी को कैंट में मिलती थी. हमको थोडा देर बाद एकदम मज़ा आ गया. थोडा कडवा लगा था शुरू में पर थोडा देर बार शरीर एकदम रिलैक्स हो गया. अब जो है, हमको लगने लगा कि साला क्या चीज़ है शराब! हमको एकदम नया दुनिया में लेके गया. उस वक़्त तो एकदम ऐसा लगा जैसे दुनिया जहान का सारा टेंशन साइड लाइन हो गया…

अब हम दोनों का रात में खाने के बाद पीना रोज का धंधा हो गया. कभी कभी दिन में सिर थोडा पकड़ता था लेकिन चाय वाय पीने के बाद ठीक हो जाता था. कुछ टाइम बाद उसने अपने बाबू जी से पैरवी लगा के हमको वहीँ कैंट में टेलरिंग का काम भी दिलवा दिया. बोला कि “जब तुमको टेलरिंग ही करना है तो यहाँ करो यहाँ पैसा भी अच्छा मिलेगा.” पैसा सच में दुकान से अच्छा था. तो अब हम दुकान का नौकरी छोड़ के वहीँ बटालियन का कपडा सीने लगे. फौजी लोग का वर्दी. धीरे धीरे वहाँ काम इतना होने लगा कि हम रात रात भर काम करने लगे. तब भी जो है काम पूरा ना पड़े. काम बढ़ता जाता था टेलर बढ़ते नहीं थे. टेंशन बहुत ज्यादा और अब इस टेंशन में हम शराब पीना और ज्यादा कर दिए. लेकिन कुछ दिनों के बाद हमको लग गया कि इतना काम तो हमसे ना हो पाएगा. फिर एक दिन खीझ के हम वो काम भी छोड़ दिए. उसी रात वो हमारा दोस्त हमको बताया कि उसकी नौकरी मद्रास (जो अब चेन्नई है) में लग गई है. वो कुछ दिन बाद मद्रास चला गया और हम अपना परिवार ले के उसके बंगला से बाहर एक मकान किराया पर ले लिए. फिर से पुराना टेलरिंग दुकान पर काम करने लगे.

लेकिन उसके जाने से एक बात यह खराब हुआ कि अब हमको फ्री का शराब नहीं मिलता. पर आदत हो गई थी पीने की. तो हम अब रोज़ शाम को घर आते हुए शराब का एक छोटा वाला बोतल भट्टी से खरीदने लगे. रास्ते में खोल लेते और घर आते आते ख़तम कर देते. धीरे धीरे शराब का खर्चा चालीस रुपया से बढ़ के नब्बे रुपया हो गया. थोड़े दिन में ही हमको ये बात पता चल गई कि हमारा दो सौ रुपया रोज के कमाई में हम इतना खर्च नहीं कर पाएँगे. लेकिन हमको शराब तो चाहिए था. तो अब हम प्लास्टिक वाला पाउच मारने लगे. लेकिन पाउच कहाँ बराबरी करे अंगरेजी शराब का. उसमे ना तो अंगरेजी वाला मज़ा था ना अंगरेजी वाला नशा. लेकिन क्या करें…? तो अब हम उसका मात्रा बढ़ा दिए. वो मात्रा बढती ही गई और धीरे धीरे खर्चा फिर से उतना ही पहुँच गया.

शुरू शुरू में तो हमारी बीवी समझ जाती थी कि हम पी के आ रहे हैं, लेकिन कुछ कहती नहीं थी. पर अब हमारी हालत ऐसी हो गई कि अब साला रे... हमको सुबह उठते उठते चाहिए. और जब एक बार शुरुआत ही उसी चीज़ से हो गई तो अब दिन भर चाहिए. अब हमारा सुबह, दोपहर, शाम सब एक हो गया.

धीरे धीरे आदत और बिगड़ी. कोई मोहल्ला का आदमी कोई रिश्तेदार, कोई जानकार हमको मना भी करता तो हम उसको गरियाने लगते. हमको लगता ये हमको क्यों बोल रहा है? इसके पैसा का थोड़े पी रहे हैं हम. हम पूरे दिन धुत्त रहते. टेलरिंग का काम भी छूट गया. हम हर शाम को भट्टी पर चले जाते और पीते रहते. उस वक़्त तो ऐसा लगता था कि हमारे नस में खून के जगह दारु बहने लगा है. घर में न बच्चा का ख्याल है ना बीवी का. हर टाइम बस एक ही बात का रट लगा हुआ है कि पीना है... पीना है. जबकि ऐसी बात नहीं है कि हमको पता नहीं चल रहा था कि हमारी ज़िन्दगी किस तरफ जा रही है लेकिन उसके ऊपर हमारा कोई कंट्रोल नहीं था. हम अपना कण्ट्रोल साला दारु के हाथ में दे दिए थे.

घर का हालत बिगड़ता जा रहा था. हम सब देख रहे थे अपने सामने खुद को बर्बाद होते हुए अपना घर बर्बाद होते हुए. इसी हमारे बच्चे का स्कूल में एडमिशन हुआ. स्कूल जिनका था वो जानने वाले थे तो उन्होंने उसका कोई पैसा नहीं लिया. बस बोला कि आप लोग इसके कॉपी किताब और ड्रेस का खर्चा देख लीजिएगा. पर जब हम अपना हिसाब लगाए तो पता चला कि घर में उतना पैसा है ही नहीं. अब हमारे पीने से पैसा बचे तब तो कुछ और काम हो. हमने अपने दोस्त लोग से इस बारे में बात किए, लेकिन वो सब उधार देने से मना कर दिया. दरअसल बात ये थी कि जब कोई बेवडा आदमी पैसा माँगता है तो लोग को लगता है कि बहाना बना रहा है. इसका तो ये शराब पी जाएगा. भले ही उसका सच में कुछ ज़रूरी काम हो. लकिन कोई उसके बात को पर्तियाता नहीं है. धीरे धीरे समाज उसका बहिष्कार करने लग जाता है. तो हमको भी किसी ने उस दिन पैसा नहीं दिया. ये बात हमको कहीं ना कहीं लग गई.

उसी दिन जब हम शाम को भट्टी पर बैठ के पी रहे थे तो हमारे अन्दर से एक आवाज़ आई. अब देखिए, आपको कोई और बताए ना बताए लेकिन आपका अंतर्मन आपको बताता है कि बाबू तुम सही कर रहे हो कि गलत. उस दिन हम खुद सोचे कि हम जो है... कर क्या रहे हैं? अपने आप से सवाल किए और फिर अपना नाम ले के सोचे कि मोहम्मद मोजिद खान, आज जितना पीना है उतना पी लो, और अगर आज के बाद तुम शराब को हाथ भी लगाया तो एक बाप का औलाद नहीं... उस दिन वहीं बैठ के हम खूब पिए. रोज से ज्यादा पिए पर ये सोच के कि आज आखिरी बार पी रहे हैं.

अब क्या है कि अगर कोई और आपको कुछ समझाए तो बात समझ नहीं आती है लेकिन उस दिन हमको ये बात एकबाएके समझ में आ गई थी. अगला दिन से हम शराब को हाथ भी नहीं लगाए. मन तो बहुत करता था कि थोडा पी लेते हैं, पी लेते हैं. लेकिन हमने कहा ‘नहीं’, जब एक बार मन बना लिए तो उसपर अटल रहना है. पर यह काम बहुत मुश्किल था. थोडा थोडा देर पर तलब उठता, चिडचिडापन होता, बेचैनी होता. हम ही जानते हैं हम उससे कैसे पार पाए. पर अब जब हमको शराब पीने का तलब लगता तो हम चाय पीने लगे. भट्टी के आस पास से गुज़रते तो दौड़ के पार कर जाते कि हमको इसके सामने ज्यादा देर रहना ही नहीं है. अपने पास फ़ालतू पैसा रखना भी छोड़ दिए. अब जब हम रात में घर जाते तो हमारी बीवी को पता चल जाता कि ये पहले जैसा हालत में अब घर नहीं आता. फिर एक दिन उसने हमसे इसके बारे में पूछा कि “आजकल पी के नहीं आते..?” तो हम इसका जवाब उसको दे नहीं पाए बस यही बोले कि “छोडो वो सब फालतू बात, नींद आ रहा है.” उसके बाद से हमारी उससे इस बारे में कभी बात नहीं हुई. धीरे धीरे हमारी भी आदत छूटने लगी. गली मुहल्ला में भी धीरे धीरे लोगों को पता चलने लगा कि हम शराब छोड़ दिए हैं. बीवी भी खुश थी, कहती नहीं थी पर हम जानते हैं वो खुश थी.

इस शराबी बेवडे की स्थिति में हम तीन साल रहे थे. जीवन नरक हो गया था. लगता था कि हमारा बच्चा जो बड़ा हो रहा है उसके सामने क्या संस्कार दे रहे हैं हम. लेकिन महसूस तब हुआ जब खुद महसूस किए. इसी बीच वो मारुती वाला हमारा दोस्त एक दो बार दानापुर आया, हम उससे मिले भी, कहे कि “ये क्या आदत डलवा के मद्रास चले गए तुम” तो वो हँसने लगा. कहने लगा “हम तो अभी भी रोज का दो पेग ही पीते हैं, तुमको ऐसा आदत कैसे धर लिया?” हम उसको कुछ नहीं बोले. खैर अब तो उस बात को बहुत साल हो गया. तब से हम शराब को हाथ भी नहीं लगाए. अब अपनी टेलरिंग की दुकान खोल ली है, अपना काम करते हैं. पर दुकान अभी भी घर से वही आधा घंटा के दूरी पर ही रखे हैं. सुबह सुबह घर से दुकान सुर्ती रगड़ते हुए पहुँचते हैं, रास्ते भर रगड़ते जाते हैं और जब दुकान पहुँचते हैं तो मूंह में डाल लेते हैं. क्योंकि सुर्ती ऐसी चीज़ है ना कि उसको जितना रगडा जाए उतना मज़ा देती है और सुर्ती का नशा वैसे भी कोई नशा नहीं है ये तो बस एक मनोरंजन है.

नीरज पाण्डेय दिल्ली और बैंगलोर में प्रवास कर चुके हैं और रंगमंच अभिनय व लेखन, गेमिंग एनीमेशन, कविता लेखन जैसी कलाओं में रूचि रखते हैं। फिलहाल वे मुंबई में फिल्म पटकथा लेखन का काम कर रहे हैं।

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