रंजना त्रिपाठी की कविताएँ

खाली दीवारें

नहीं भातीं खाली दीवारें
कोई तस्वीर, कोई घड़ी, कोई आईना नहीं
दीवारें किसी पराजित संसार-सी
तलाशती हैं मेरे भीतर कुछ
जैसे संताप का कोई इतिहास

अच्छे लगते हैं
दूर तक फैले सरसों के फूल
सभ्यता के अंधेरे
सन्नाटों से घिरा शोर
नदी में घुलती कोई छाया
चांदनी में डूबे कछार
पूरब के गाँव
स्वप्न का प्रेमी
ख़ुशी की लय
ग्रीष्म की शामें
पर्वतों से टकराती आवाज़
गीत गाता नाविक
महुआ के पेड़
भोर की ओट
विंध्य के वन
लहरों में गूंजती हंसी
पलकों पर अंगुलियां
और राह पर बिखरी
तुम्हारी कांपती आवाज़…

इन सब को टांग देना था
खाली दीवारों पर
क्योंकि, खाली दीवारें
मुझे विस्मय समय सी निहारती हैं
गाती हैं किसी निर्जन पठार का गीत
सुनसान अकेले मेंमुझे सुनाई नहीं पड़ती वह पुकार
जो बस गई है
इन दीवारों के जागते रंगों में

कहीं कोई चित्र उभरता है
हटी हुई पुताई की कोख से
कोई चिड़िया, मां का आँचल,
कोई गेंद, कोई धनुष
बादल का टुकड़ा, हाथी के दांत, बंदर के नाखून
कोई जंगल, कोई फूल
कोई चाँद, कोई औरत
गणित के कुछ अंक
कोई किताब, कोई टहनी

फिर भी, दीवारें ख़ाली हैं,
जिन्हें भरना है
जीवन के यथार्थ
निश्छल शोध
और उजली हँसी के समूचे संसार से।
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मेरी ख़ातिर

क्या तुम्हारे पास मिलेंगी
कुछ सुनसान हिलती पत्तियां?
जिनमें मैं अपनी हंसी जमा कर सकूं

कोई आकाश?
जहां अपनी दहलीजें लांघ
एक उड़ान भर सकूं

कोमल फूल की बेलें?
जिनके सहारे
मैं उतर सकूं तुम्हारी दुनिया में

कुछ थके परिंदे?
जिनकी नींदों में
मेरे पीछे छूटे शहर की
धुंधली बचपनी रातें हों

और,
एक कठोर धरती?
जिन पर मेरे गिरे आँसू सूखें नहीं
बल्कि
बह निकलें
मेरी मिट्टी से तुम्हारी मिट्टी तक।
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बिखराहट

सोचती हूँ
समेट लूं वह सबकुछ
जो बिखरा पड़ा है

कहीं कोई कंघा
कोई पानी का गिलास
कोई क़ागज़ का टुकड़ा
पिछले दिन का पसीने में भीगा रूमाल
शर्ट का टूटा बटन
बच्चों की गुल्लक
पुरानी फ़िल्मों के सीडी
मोबाईल का चार्जर
गीला तौलिया

साथ ही,
बचपन की यादें
जवानी के संघर्ष
दुखों की एक नदी
हंसी का फव्वारा
खुद को साबित करने की ज़िद
भूल जाने की आदत
प्रेम का पहला स्पर्श
और
मेरे आंसुओं की आख़िरी शिकायत।
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गंदी लड़की

सुनो,
एक अच्छी लड़की बनो
बड़ों-शुभचिंतकों का कहा मानो
तेज़ मत बोलो
धीरे हंसों
एकदम शालीन और शिष्ट
छत पर मत जाओ
छज्जे पर भूलकर न खड़ी होना
तुम्हारे लिए नहीं ताज़ी हवा के झोंके

रोटी बनाओ
तकली नचाओ
कातती जाओ
नाचती जाओ

नमक, चीनी, चावल, आटे के बारे में सोचो

मां का हाथ बटाओ
सीखो, वह कैसे घर संभालती है
सीखो, अपने गुस्से पर काबू रखना
घूरो मत
किताबें छोड़ो
सपने मत देखो
कविताएं मत लिखो
गीत-संगीत से दूर रहो
सुबह जल्दी उठो
पोंछा लगाओ
झाड़ू लगाओ
देहरी चमकाओ
सहेलियों के घर मत जाओ
गली के मुहाने खड़ी हो
खी-खी-खी-खी मत करो
सलवार-कमीज़ पहनो
साड़ी बांधना सीखो
खुल कर प्यार करना
तुम्हारी ज़रूरत नहीं

नफ़रत मत करो
सिर झुकाकर चलो
पैर मत हिलाओ
टांगे जोड़कर बैठो
बरदाश्त करना सीखो

नहीं करोगी?

गंदी लड़की कहीं की
नाक कटवा दी
मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा !
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स्वतंत्र पत्रकार, कवि, साहित्यकार, कहानीकार. पहला कविता संग्रह ‘कुल्हड़ में वोदका’ प्रकाशित. इन दिनों नई कहानियों पर काम कर रही हैं.

ईमेल - tripathi.ranjana22@gmail.com